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#भगवत गीता #🙏गुरु महिमा😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
भगवत गीता - अप्रकाशोडप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्यतानि जायन्त विवृद्धे कुरुनन्दना। अर्जुन! तमोगुण के बढने चर अन्तःकरण और इंन्द्रियों में कर्तव्य ्क्मो मे अप्रवत्ति औरप्रमादअ्थतव्य्थचेष्ा अ्रकश और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ य सब ही उत्पन्न होते ? Il व्याख्यः अर्जुून को तमोगुण के लक्षणों के श्रीकृष्ण इस श्लोक में भगवान बारेमे बता रहहै। तमोगुण प्रकृतिकतीन गुरण सत्त्चव, रजस तमसा मेसे एकहैजो अज्ञॉन , ऑलस्य और प्रमाद का कारण होता अप्रकाश का अर्थहै प्रकाशका अभाव अथत अज्ञानता| जब तमोगुण बढताहै तव्यक्तिकोबुद्रि ओरविवक पर अज्ञान का अंधकार छा जाता हि जिससे उसे सही और गलत का भान नहीं 6எ[I अप्रवृत्ति का अर्थ है कर्तव्य कर्मोमि अरुचि या निष्क्रियता। तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करने मे उदासीन हा जता हैअरआलस्यमेरबा रहताह अ्थहलापराही या असावधाना , ओर मोहर का अर्थ है प्रमाद ర भ्रम। तमोगुण के बढने से व्यक्ति मेभ्रम उत्पन्न होता है और वह अपनेजीवनॅ के सही मार्गसे भटक जाता हा वहव्यर्थचेष्टाओं और मोहरमे उलझ जाता ह जिससे उसकी प्रगति रुक जाती है और चह कदुरखों मे फंस जाता हा ससार इस प्रकार , इस श्लोक मे भँगवान श्रीकृष्ण अर्जन को समझा रहे हैं किजब तमोगुण प्रबल होता हैरता व्यक्ति के मन मे अज्ञान[ निष्क्रियता, ऑलस्य ओर भ्रम का संचार होता ह। इसे समझकर अर्जन का तमागृण स बचन का प्रयास करना चाहिप अप्रकाशोडप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्यतानि जायन्त विवृद्धे कुरुनन्दना। अर्जुन! तमोगुण के बढने चर अन्तःकरण और इंन्द्रियों में कर्तव्य ्क्मो मे अप्रवत्ति औरप्रमादअ्थतव्य्थचेष्ा अ्रकश और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ य सब ही उत्पन्न होते ? Il व्याख्यः अर्जुून को तमोगुण के लक्षणों के श्रीकृष्ण इस श्लोक में भगवान बारेमे बता रहहै। तमोगुण प्रकृतिकतीन गुरण सत्त्चव, रजस तमसा मेसे एकहैजो अज्ञॉन , ऑलस्य और प्रमाद का कारण होता अप्रकाश का अर्थहै प्रकाशका अभाव अथत अज्ञानता| जब तमोगुण बढताहै तव्यक्तिकोबुद्रि ओरविवक पर अज्ञान का अंधकार छा जाता हि जिससे उसे सही और गलत का भान नहीं 6எ[I अप्रवृत्ति का अर्थ है कर्तव्य कर्मोमि अरुचि या निष्क्रियता। तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करने मे उदासीन हा जता हैअरआलस्यमेरबा रहताह अ्थहलापराही या असावधाना , ओर मोहर का अर्थ है प्रमाद ర भ्रम। तमोगुण के बढने से व्यक्ति मेभ्रम उत्पन्न होता है और वह अपनेजीवनॅ के सही मार्गसे भटक जाता हा वहव्यर्थचेष्टाओं और मोहरमे उलझ जाता ह जिससे उसकी प्रगति रुक जाती है और चह कदुरखों मे फंस जाता हा ससार इस प्रकार , इस श्लोक मे भँगवान श्रीकृष्ण अर्जन को समझा रहे हैं किजब तमोगुण प्रबल होता हैरता व्यक्ति के मन मे अज्ञान[ निष्क्रियता, ऑलस्य ओर भ्रम का संचार होता ह। इसे समझकर अर्जन का तमागृण स बचन का प्रयास करना चाहिप - ShareChat