🙏राम राम जी : CJC🙏
*अतिचतुराई...*
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शहर का सबसे भीड़भाड़ वाला बाज़ार... अचानक एक आदमी हाथ में माइक और नोटों की गड्डी लेकर चिल्लाने लगा- *"सुनो! सुनो! सुनो! आज मेरी कंपनी की 10वीं सालगिरह है और इस खुशी में मैं हर किसी को 500-500 के नोट मुफ्त बाँट रहा हूँ!"*
लोग रुके, उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर आपस में कानाफूसी शुरू हो गई।
एक सेठ जी बोले, *"हूँ! बड़ा आया नोट बाँटने वाला। जाली नोट खपाने का नया तरीका है इसका।"*
एक नौजवान हंसकर बोला, *"भाईसाहब, आजकल कोई फ्री में सलाह नहीं देता, ये 500 का नोट देगा?*
कोई और बोला, *"पक्का पीछे कोई कैमरा छुपा होगा, प्रैंक कर रहा है!"*
पूरा दिन बीत गया। *_वह आदमी धूप में खड़ा नोट लहराता रहा, चिल्लाता रहा... लेकिन 'अति-होशियार' भीड़ उसे पागल समझकर बचकर निकलती रही।_*
लोग शक की ऐसी चादर ओढ़े थे कि उन्हें सामने दिख रही गड्डी भी कागज़ का टुकड़ा लग रही थी।
*सूरज ढलने को था, तभी एक छोटा सा बच्चा, जो दुनिया की 'चालाकियों' से बिल्कुल अनजान था, दौड़ता हुआ उस आदमी के पास गया और चुपचाप हाथ फैला दिया।*
आदमी मुस्कुराया और उसकी हथेली पर एक कड़कड़ाता 500 का नोट रख दिया।
बच्चा खुशी-खुशी अपने पिता के पास भागा। पिता ने जैसे ही नोट हाथ में लिया, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं- *"अरे! ये तो एकदम असली है! गांधी जी एकदम साफ़ दिख रहे हैं!"*
जैसे ही बाज़ार में शोर मचा कि "नोट असली हैं!", *तमाशा देखने वाली भीड़ अचानक 'जंगली भेड़ियों' की तरह उस आदमी की तरफ झपटी !* हर कोई एक-दूसरे को धक्का देकर नोट छीनने के लिए पागल हो गया।
*लेकिन... पासा पलट चुका था ! वह आदमी अपनी लक्ज़री गाड़ी में बैठ चुका था।*
उसने शीशा नीचे किया और हाथ हिलाते हुए बड़े ठंडे अंदाज़ में कहा: *"शांत हो जाइए भाइयों! मैं यहाँ पैसे बाँटने नहीं आया था, मैं तो बस यह देखने आया था कि इस शहर में अब भी कितने लोग हैं जो बिना शक के, बिना स्वार्थ के, किसी की बात पर भरोसा कर सकते हैं।"*
"आज मुझे सिर्फ एक ही ऐसा इंसान मिला—वो मासूम बच्चा, जिसने बिना किसी लालच के, बिना किसी डर के, मुझ पर विश्वास किया। बाकी सबने मुझे ठग, पागल या धोखेबाज़ समझा।"
*"आप सबने अपनी 'चालाकी' में वो मौका खो दिया, जो शायद ज़िंदगी में दोबारा न मिले।"*
*_"याद रखिए, हर बार धोखा नहीं होता... और हर बार मौका दोबारा नहीं आता।"_*
इतना कहकर उसने गाड़ी का शीशा चढ़ाया, एक्सीलेटर दबाया और भीड़ को पीछे छोड़ते हुए वहाँ से निकल गया।
*भीड़ अब भी खड़ी थी—कुछ अफ़सोस में, कुछ शर्म में, और कुछ अब भी सोच रहे थे कि शायद ये भी कोई चाल थी।*
लेकिन सच तो यही था—भरोसे की परीक्षा में पूरा शहर फेल हो गया था... सिवाय उस मासूम बच्चे के।
दोस्तों, *अक्सर अत्यधिक शक्की होने या अतिचतुर बनने की कोशिश में हम जीवन के सच्चे अवसरों को खो देते हैं। क्योंकि जब हम हर चीज़ को संदेह की नज़र से देखने लगते हैं, तो भरोसे की जगह डर और भ्रम ले लेता है, जो हमारी किस्मत के दरवाज़े पर ताला लगा देती है। इसलिए हर अवसर को खुले दिल और सकारात्मक सोच के साथ अपनाना चाहिए।*
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