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यदि किसी एक मनुष्य को ही संसार की सभी तरह की सुख संपत्ति वैभव सुविधाएं अर्थात उसकी मनपसंद अनुकूल चीजे उपलब्धियां सफलताएं संपत्ति सुख सुविधाएं जीवन में हासिल हो जाए तब भी वह सदैव पुर्ण प्रसन्न सुखी, संतुष्ट नहीं रह सकता है क्योंकि संतुष्टि प्रसन्नता निरंतर सच्चे सकुन शांति का सुख निरंतर श्रेष्ठ कर्म स्वभाव बुद्धि विवेक व्यवहार के अधीन है इसके लिए अपने सुख संपत्ति की चाहत से ऊपर उठकर सबके हित के काम भी करने पड़ते हैं तभी गीता का कर्मयोग भक्तियोग ज्ञानयोग फलीभूत होता है वरना मन मलीन ही रहता है और*"निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा।""* श्री रामचरितमानस 🙏🏻 सागर सिमरोल #सुविचार #सत्य वचन #😍वेलकम 2026🎊 #😍वेलकम 2026🎊 #Suvichar #anmol vachan
सुविचार - यदि किसी एक मनुष्य को ही सूंसार की सभी तरह की सुख संपत्ति वैभव अर्थात उसकी मनपसंद अनुकूल శగిరా उपलब्धियां सफलताएं संपत्ति सुख जीवन में हासिल हो जाए तँब भीुविधाएं संतुष्ट नहीं ஸர वह सदैव सुखी प्रसज्न क्योंकि प्रसन्नता संतुष्टि रह सकता ஈசு निरंतर सच्चे सकुन शांति का सुख লিভি विवेक व्यवहार श्रेष्ठ कर्म स्वभाव মিলক্কি अधीन है इसके अपने सुख की चाहत से ऊपर उठकर सबँके हित काम भी करने पड़ते हैं तभी गीता का फलतभूह कर्मयोग भक्तियोगं ज्ञानयोग होता है वरना मन मलीन ही रहता और* निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि छिद्र न भावा।"* श्री कपट छल रामचरितमानस सागर सिमरोल यदि किसी एक मनुष्य को ही सूंसार की सभी तरह की सुख संपत्ति वैभव अर्थात उसकी मनपसंद अनुकूल శగిరా उपलब्धियां सफलताएं संपत्ति सुख जीवन में हासिल हो जाए तँब भीुविधाएं संतुष्ट नहीं ஸர वह सदैव सुखी प्रसज्न क्योंकि प्रसन्नता संतुष्टि रह सकता ஈசு निरंतर सच्चे सकुन शांति का सुख লিভি विवेक व्यवहार श्रेष्ठ कर्म स्वभाव মিলক্কি अधीन है इसके अपने सुख की चाहत से ऊपर उठकर सबँके हित काम भी करने पड़ते हैं तभी गीता का फलतभूह कर्मयोग भक्तियोगं ज्ञानयोग होता है वरना मन मलीन ही रहता और* निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि छिद्र न भावा।"* श्री कपट छल रामचरितमानस सागर सिमरोल - ShareChat