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#Jai Shri Radhe
Jai Shri Radhe - "भक्तापराध" गिरिराजजी தி பிக # राधाकुण्डके श्रीरघुनाथदास गोस्वामीजी  भावजगत् ्में लीलादर्शन कर रहे थे। इन्होंने देखा कि श्रीराधारानी लताकुंज के फूलों से श्रृंगार करना चाहती है॰ इस निमित्त श्रीकृष्ण ने उन्हें गोद में उठा ম দ্রুষ্প  रखा है और वे लता चयन कर श्रीकृष्ण  रही हैं। विनोद में ने उनका हाथ छोड़ दिया और वे गिरने के भय से गयीं 4 पकड़कर लता लटक श्रीजी की चरण सेवा भावजगत् में यह सब लीला देखकर श्रीरघुनाथदासजी जोर से हँस पड़। संयोग से उसी समय एक लंगड़े महात्मा श्रीखञ्जकृष्णदासजी उधर से निकले और उन्हें लगा कि॰ उनके   लँगड़ेपन की हँसी उड़ा   रहे  हैं। रघुनाधदास तत्काल श्रीरघुनाथदास  का भावजगत् का लीलादर्शन बन्द हो गयी। उन्हें इस  बात की बड़ी पीडा रहने लगी और वे इसका कारण खोजने लगे।  उन्हें लगा कि उनसे किसी सन्त का अपराध हुआ होगा और प्रायश्चित्त स्वरूप उन्होंने एक भण्डारे का आयोजन किया, जिसमें लँगड़े महात्मा श्रीखञ्जकृष्णदासजी भी आमंत्रित हुए। स्वभावतः उनके मुँह से निकला - पहले हँसी उड़ाते हैं, अब भक्ति दिखा रहे हैं।' श्रीरघुनाथदासजी ने अपनी भावजगत् के लीला दर्शन की बात जब उन्हें बतायी तब खञ्जकृष्णदास को बहुत ग्लानि हुई और उन्होंने श्रीरघुनाथदास से क्षमा प्रार्थना की। इस घटना से यह पता बार्बार में हुआ  चलता है कि अनजाने भक्तापराध भी अमंगल का हेतु बना UTగT గ1 (९४|२) कल्याण जय जय श्री राधे श्रीजी की चरण सेवा "भक्तापराध" गिरिराजजी தி பிக # राधाकुण्डके श्रीरघुनाथदास गोस्वामीजी  भावजगत् ्में लीलादर्शन कर रहे थे। इन्होंने देखा कि श्रीराधारानी लताकुंज के फूलों से श्रृंगार करना चाहती है॰ इस निमित्त श्रीकृष्ण ने उन्हें गोद में उठा ম দ্রুষ্প  रखा है और वे लता चयन कर श्रीकृष्ण  रही हैं। विनोद में ने उनका हाथ छोड़ दिया और वे गिरने के भय से गयीं 4 पकड़कर लता लटक श्रीजी की चरण सेवा भावजगत् में यह सब लीला देखकर श्रीरघुनाथदासजी जोर से हँस पड़। संयोग से उसी समय एक लंगड़े महात्मा श्रीखञ्जकृष्णदासजी उधर से निकले और उन्हें लगा कि॰ उनके   लँगड़ेपन की हँसी उड़ा   रहे  हैं। रघुनाधदास तत्काल श्रीरघुनाथदास  का भावजगत् का लीलादर्शन बन्द हो गयी। उन्हें इस  बात की बड़ी पीडा रहने लगी और वे इसका कारण खोजने लगे।  उन्हें लगा कि उनसे किसी सन्त का अपराध हुआ होगा और प्रायश्चित्त स्वरूप उन्होंने एक भण्डारे का आयोजन किया, जिसमें लँगड़े महात्मा श्रीखञ्जकृष्णदासजी भी आमंत्रित हुए। स्वभावतः उनके मुँह से निकला - पहले हँसी उड़ाते हैं, अब भक्ति दिखा रहे हैं।' श्रीरघुनाथदासजी ने अपनी भावजगत् के लीला दर्शन की बात जब उन्हें बतायी तब खञ्जकृष्णदास को बहुत ग्लानि हुई और उन्होंने श्रीरघुनाथदास से क्षमा प्रार्थना की। इस घटना से यह पता बार्बार में हुआ  चलता है कि अनजाने भक्तापराध भी अमंगल का हेतु बना UTగT గ1 (९४|२) कल्याण जय जय श्री राधे श्रीजी की चरण सेवा - ShareChat