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#GodMorningMonday #जनसेवक_रत्न_संतरामपालजी . पांच यज्ञ आवश्यक अध्याय 4 के श्लोक 31.32 में कहा है कि गीता अध्याय 4 श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्राविरूद्ध साधना से बचे हुए साधक शास्त्राविधि अनुसार अर्थात् नाम साधना करते हैं। वे यज्ञ से अलग सतनाम व सारनाम के जाप रूपी अमृत का अनुभव करने वाले पूर्ण परमात्मा को प्राप्त होते हैं। यज्ञ भी आवश्यक बताते हुए कहा है कि नाम साधना के साथ पाँचों यज्ञ धर्म, ध्यान, हवन, प्रणाम, ज्ञान भी आवश्यक हैं। जैसे सतनाम व सारनाम रूपी बीज बीजकर उसमें यज्ञ रूपी खाद पानी भी अति आवश्यक है। जिससे भक्ति रूपी पौधा परिपक्व होता है। यदि केवल नाम साधना करते रहे यज्ञ नहीं किए तो जैसे पान और खाद के अभाव से पौधा सूख जाता है, इसी प्रकार यज्ञ न करने से साधक अहंकारी, दयाहीन, श्रद्धाहीन, हो जाता है। वास्तविक जाप मंत्र बिना केवल यज्ञ करना भी निष्फल है। गुरु बिन यज्ञ हवन जो करही, निष्फल जाएं कबहुं नहीं फलहीं कई व्यक्ति गुरूद्रोही होकर तीन नाम और पांचों यज्ञ कराते है। वह भी बेकार है। क्योंकि बिना अधिकारी से यज्ञ व पाठ करवाना व्यर्थ है। तथा जिसके पास सत्य भक्ति तीन मंत्र की नहीं है, वह भी अन् अधिकारी होता है। पूर्ण संत जो पूर्ण परमेश्वर की वास्तविक साधना बताता है उसे गुरु बना कर उसी के माध्यम से सर्व धार्मिक अनुष्ठान करवाना हितकर है।परमात्मा कबीर साहिब जी कहते है कि कबीर~ गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।। एक बार राजा परिक्षित को सातवें दिन सर्प ने डसना था। उस समय सर्व ऋषियों ने यह निर्णय लिया कि राजा को सात दिन तक श्रीमद्भागवद सुधासागर का पाठ सुनाया जाये, ताकि राजा का मोह संसार से हट जाए। कौन ऐसा कथा करने वाला ऋषि है जिसके पाठ करने से राजा का कल्याण हो सके ? सातवें दिन पता लग जाना था कि कथा करने वाला अधिकारी है या नहीं। इसलिए पृथ्वी पर उपस्थित सर्व ऋषियों व महर्षियों ने पाठ करने का कार्य स्वीकार नहीं किया। क्योंकि वे महापुरुष प्रभु के संविधान से परिचित थे। इसलिए राजा परिक्षित के जीवन से खिलवाड़ नहीं किया तथा जो ढोंगी थे वे इस डर से सामने नहीं आए कि सातवें दिन पोल खुल जायेगी। उस समय स्वर्ग से महर्षि सुखदेव जी बुलाए गए जो विमान में बैठ कर आए। आते ही श्री सुखदेव जी ने राजा परिक्षित जी से कहा कि राजन आप मेरे से उपदेश प्राप्त करो अर्थात् मुझे गुरु बनाओ तब कथा करने का फल प्राप्त होगा। राजा परिक्षित ने श्री सुखदेव जी को गुरु बनाया तब सात दिन श्री भागवत सुधासागर की कथा सुनाई। राजा को सर्प ने डसा। राजा की मृत्यु हो गई। सूक्ष्म शरीर में राजा परिक्षित अपने गुरु श्री सुखदेव जी के साथ विमान में बैठ कर स्वर्ग गए। क्योंकि पहले राजा बहुत धार्मिक होते थे, पुण्य करते रहते थे। राजा परिक्षित ने श्री कृष्ण जी से उपदेश भी प्राप्त था। उन्हीं के मार्ग दर्शन अनुसार बहुत धर्म किया था। परन्तु बाद में कलयुग के प्रभाव से ऋषि भिंडी के गले में सर्प डालने से तथा अन्य मर्यादा हीन कार्य करने से राजा परिक्षित का उपदेश खण्ड हो गया था। उस समय न तो किसी ऋषि जी ने राजा को उपदेश दे कर शिष्य बनाने की हिम्मत की, क्योंकि वे गुरु बनने योग्य नहीं थे। उन्हें उपदेश देने का अधिकार नहीं था। केवल श्री कृष्ण जी ही उपदेश देते थे, जो पाण्डवों के भी गुरु जी थे तथा छप्पन करोड़ यादवों के भी गुरु जी थे। राजा परिक्षित के पुण्यों के आधार से श्री सुखदेव जी गुरु बन कर उसको कथा सुनाकर संसार से आस्था हटवा कर केवल स्वर्ग ले गए। इतना लाभ राजा परिक्षित को हुआ। स्वर्ग का समय पूरा होने अर्थात् पुण्य क्षीण होने के उपरान्त राजा परिक्षित तथा सुखदेव जी भी नरक जायेंगे, फिर चौरासी लाख प्राणियों के शरीर में नाना कष्ट उठायेंगे। जन्म-मृत्यु समाप्त नहीं हुआ अर्थात् मुक्त नहींं हुए। वर्तमान के सन्तों व महन्तों को स्वयं ही ज्ञान नहींं कि हम जो शास्त्रा विरुद्ध साधना कर तथा करवा रहे हैं यह कितनी भयंकर कष्ट दायक दोनों को होगी। इसलिए पुनर्विचार करना चाहिए तथा झूठे गुरुजी को तथा शास्त्र विरुद्ध पूजाओं को तुरन्त त्याग कर सत्य साधना प्राप्त करके आत्म कल्याण करवाना चाहिए। वह साधना मुझ दास के पास पूर्ण रूपेण उपलब्ध है। यदि गुरु जी से नाम नहीं ले रखा है वैसे यज्ञ करता रहे वह भी निष्फल है पूर्ण सन्त से वास्तविक मन्त्रा सत्यनाम व सारनाम का उपदेश लेकर नाम जाप तथा पाँचों यज्ञ नहीं करते तो उनको इस लोक में ही कोई लाभ नहीं होगा फिर परलोक में कैसे हो सकता है? भावार्थ है कि पूर्ण सन्त द्वारा दिया पूर्ण भक्ति मार्ग ही लाभदायक है। गरीब , जैसे सूरज के आगे बदरा ऐसे कर्म छया रे। प्रेम की पवन करे चित मन्जन झल्के तेज नया रे।। जैसे सूर्य के सामने बादल होते है ऐसे पाप कर्मों की छाया जीव व परमात्मा के मध्य हो जाती है। पूर्ण सन्त की शरण में शास्त्रविधि अनुसार साधना करने से, प्रभु की भक्ति रूपी मन्जन से प्रभु प्रेम रूपी हवा चलने से पाप कर्म रूपी बादल हट कर भक्त के चेहरे पर नई चमक दिखाई देती है। अर्थात् परमात्मा से मिलने वाला लाभ प्रारम्भ हो जाता है। यही प्रमाण गीता अध्याय18 श्लोक 61 में है कि पूर्ण परमात्मा प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार यन्त्रा की तरह भ्रमण करवाता है तथा जैसे पानी के भरे मटकों में सूर्य प्रत्येक में दिखाई देता है, ऐसे परमात्मा जीव के हृदय में दिखाई देता है। गीता अध्याय18 श्लोक 46में भी यही प्रमाण है कि जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने वास्तविक कर्मों द्वारा पूजा करके मानव परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है । गीता ज्ञान दाता कहता है कि हे अर्जुन! यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा को इष्ट रूप में मान कर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथ साथ वास्तविक नाम का सुमरण करके पूर्ण मोक्ष रूपी अमृत को प्राप्त हो जाता है अर्थात् पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। Sa News Channel YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
sant ram pal ji maharaj - सतगुरु वही है जिसकी बताई साधना से साधक का मोक्ष होता है। सतगुरू रामपाल जीमहाराज SupremeGodorg Satlok Ashram BETUL सतगुरु वही है जिसकी बताई साधना से साधक का मोक्ष होता है। सतगुरू रामपाल जीमहाराज SupremeGodorg Satlok Ashram BETUL - ShareChat