|| बावरी गोपी ||
(8)
कुछ सखियों ने कहा था,
‘तेरे भाग्य फूट गये, सखी!
अब तू किसी काम की नहीं रहेगी,
कुञ्जबिहारी को देखते ही सुध-बुध खो बैठेगी।
घर-द्वार, काम-काज सब भूल जायगी।
कन्हैया की वंशी की एक टेर सुनते ही
तू बावरी हो जायगी।’
मैंने कहा था,
‘तुम पगली हो क्या?
मैं उसे देखूँगी ही नहीं,
उसकी वंशी सुनूँगी ही नहीं।’
तब सखियों ने हँसकर बताया था,
‘इस भ्रम में मत रहना कि तू देखेगी ही नहीं,
उसकी वंशी सुनेगी ही नहीं।
वह बरबस तुझे अपनी ओर आकर्षित करेगा,
बरबस अपनी वंशी सुनायेगा।
मार्ग में आते-जाते छेड़ेगा।
अभी कुशल है,
पिता जी से कह दे कि ‘मैं वहाँ ब्याहकर न जाऊँगी।
तू न कह सके तो बोल, हम कह दें।’
मेरी प्यारी सखियों ने तो इस प्रकार सावधान किया था,
किन्तु मैंने ही उनकी सम्मति की उपेक्षा की।
मैंने कहा था,
‘वाह रे, कोई जबरदस्ती है?
मेरा जिससे कोई सम्बन्ध नहीं,
वह मुझे मार्ग में क्यों छेड़ेगा?
और यदि छेड़ेगा भी तो मैं डाँट दूँगी,
उसका मुझे डर लगता है क्या?
मैं एक छोकरे के भय से
अपने पिता से ऐसी धृष्टता क्यों करूँ?
तुम उनसे कुछ न कहना,
मैं वहीं जाना चाहती हूँ।
देखूँगी वह मुझे कैसे आकर्षित करता है।’
आह! मेरा यही अभिमान
आज मेरी वेदना का कारण बना है
🙏🏽🌷 *श्री राधे*🌷🙏🏽 #जय श्री किर्ष्णा राधे राधे


