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2.4 भगवन्नाम महिमा भाग-1- द्वारा श्री स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी नारायण, जो नाम है, वही भगवान हैं और जो भगवान हैं, वही नाम है। दोनों में परस्पर प्रीति है। असल में नाम और नामी दोनों में एक ही ईश्वर भरा हुआ है। नाम शब्द का अर्थ होता है- अर्थात्‌ “नमयति नामयति वा भगवन्तम्‌? यह भगवान को कोमल बनाकर हमारे हुदय में ले आता है अथवा भक्त के अहंकार को छुडाकर भगवान से मिला देता है । श्रीमद्भागवत में तो यहा तक लिखा है कि जैसे कोई बच्चे को नाम लेकर पुकारे 'मोहन’ और बच्चा दौड़कर आ जाये, वैसे कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण कहकर पुकारो और हाथ में बांसुरी लिये, कमर में करधनी बांधे, हाथ में कंगन और माथे पर गोरोचन का तिलक, गले में वनमाला, और वे दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ जायें, कृष्ण ! यह नाम कैसे लेना? जैसे प्यासा व्यक्ति पानी को पुकारता है - पानी, पानी, पानी या जैसे तृप्त व्यक्ति तृप्त होकर भगवान का नाम बोले और यदि वियोग की भावना हो तो प्यासे की तरह भगवान का नाम बोले। भगवान का नाम एक धुंधली सी छवि पहले आपके सामने लाकर खड़ा करेगा, पहले आभास होगा जैसे अंधकार में ही कोई चल-फिर रहा है। अगर आपके हृदय में अमावस्या की रात्रि के समान अंधकार है तो उसमें धीरे-धीरे श्रीकृष्णचन्द्र की किरणों का प्रकाश होता है। यही भगवान को कृष्णचन्द्र, रामचन्द्र कहने का भी अभिप्राय होता है। चन्द्रमा मन का देवता है और यह मन में प्यार जगाने वाला होता है । नाम-जप पहली बात, जहाँ आप नाम-जप के लिए बैठे, वह स्थान पवित्र हो और एकांत हो। दूसरी बात, जिस आसन पर बैठे वह भोजन का आसन न हो, सोने का आसन न हो, लोगों से गप्प हॉकने का आसन न हो; केवल भजन के लिये ही आसन हो । तीसरी बात, बैठें तो मानसिक रूप से पवित्र होकर बैठें और ऐसे आसन से बैठें कि हिलें-डोलें नहीं । स्थिरसुखमासनम्‌ ! जिसमें हम पूरे आराम से बैठ सकें, उसका नाम "आसन” होता है । जितना प्रारम्भ किया जाय, उससे एक-दो मिनट बढ़ता जाये परन्तु उससे कम न हो । अगर रोगी अथवा वृद्ध न हो तो पीठ की रीढ़ सीधी रखनी चाहिये। एक स्थान पर एक दिन में बैठने के ढंग में भी विचार के संस्कार होते हैं । तो नारायण, हमको ईश्वर प्राप्त करना है और उस ईश्वर का अमुक नाम है और उसे ही नियमित रूप से ले । तुम्हारा लक्ष्य होवे, तब तो नाम का जप तुम्हारे मन को एकाग्र कर के समाधि में पहुँचायेगा और यदि ज्ञान तुम्हारा लक्ष्य होवे तो नाम का जप तुम्हारे चित्त को शुद्ध कर के महावाक्य के द्वारा आहित हृदय में ब्रह्माकार-वृत्ति कर देगा। और, यदि तुम्हें ब्रह्माकार-वृत्ति नहीं चाहिये और समाधि भी नहीं चाहिये, ज्ञान और कर्म का आवरण यदि तुम्हारे चित्त में नहीं है तो यह नाम-जप-जिसके नाम का जप होता है, उसके प्रति प्रीति उत्पन्न कर देता है । अब एक और बात आप को सुनाते हैं कि जिन लोगों का यह विचार है कि नाम-जप करने में जब एकाग्रता हो तब नाम का फल होता है, वे लोग नाम की महिमा को कम जानते हैं । यहाँ तक कि भागवत का तो कहना है कि, ज्ञान से जपो, चाहे अज्ञान से जपो, जैसे अनजांने में भी छूने पर आग जला देती है, इसी प्रकार अनजाने में भी लेने पर यह नाम पाप-राशि को भस्म कर देता है। नाम पाप को मिटाने में जितना समर्थ है, उतना पाप कोई पापी कर ही नहीं सकता। हम केवल नामोच्चारण करते हैं, सो भी ईश्वर की कृपा से, ईश्वर के अनुग्रह से। वही यहाँ बैठकर हमारे मुँह से नाम की प्रेरणा देता है तब नाम का उच्चारण होता है। इसलिये जब नाम के उच्चारण में भी ईश्वर हेतु है, तो नाम के फल-दान में ईश्वर हेतु होगा-ही-होगा। अत: नाम का फल स्वातन्येण ईश्वर देता है, उसमें हमारी श्रद्धा का कोई उपयोग नहीं है। श्रद्धा इस बात की सूचक है कि शीघ्र अति शीघ्र ईश्वर की कृपा होगी। परन्तु, नाम का फल ईश्वर भी नहीं, नाम का फल तो नाम ही देता है - नाम पर विश्वास करने वाले लोग ऐसा मानते हैं। जैसे बूँद-बूँद अमृत गिर रहा हो, तो अमृत की प्रत्येक बूँद हमारे अमृतत्व और स्वाद को, रस को बढ़ाती है; इसी प्रकार यह जो हमारी जिह्वा, कण्ठ में भगवान का नाम आता है, यह नाम नहीं है, क़ृष्ण, क़ृष्ण क़ृष्ण - यह अमृत की बूँद है और न इसमें एकाग्रता की जरूरत है और न इसमें श्रद्धा की बाध्यता है। यह ईश्वर की शक्ति, ईश्वर के अनुग्रह से ही हमारा कल्याण करता है । एक और बात इसके सम्बन्ध में सुनाता हूँ, यदि आप नाम से अंत:करण की शुद्धि चाहते हैं और ज्ञान चाहते हैं तो नाम अपने अर्थ को प्रकाशित करेगा । नाम में प्रकाशकत्व है। प्रकाशकत्व कैसे है ? 'रूमाल लाओ” यह कहने पर आपके मन में “रूमाल” नाम की वस्तु प्रकाशित होती है । नाम अर्थ का प्रकाशक होता है, इसलिये नाम ज्ञान का जनक होता है, परन्तु, यदि आपको केवल अर्थ ही चाहिये, नाम नहीं चाहिये, तो नाम अपना अर्थ देकर लुप्त हो जायेगा । अब आप प्रेम की बात देखो ! नाम जब प्रेमांश का दान करता है तो प्रेमांश में न तो ज्ञान के समान अद्वेत है और न समाधि के समान अभान है, उसमें दूसरी कोई चीज अच्छी नहीं लगती, इसलिये, भक्ति की पराकाष्ठा होने पर भी भक्त के मुख से नाम का उच्चारण होता रहेगा- कृष्ण कृष्ण । वह नाम का उच्चारण जब प्रेमदान करेगा तब तो नाम छूटेगा नहीं ! प्रेम और नाम बिलकुल एक भाव हैं, इसलिये उन लोगों को नाम का आनंद आ जाता है । समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परस्पर प्रभु अनुगामी ।। क्रमस : भाग-2 #༺꧁🙏🏼 जय श्री राधे कृष्णा ग्रुप *🙏🏼 ꧂༻ #🙏भक्ति 🌺 #🙏भगवान की प्रेम कथाएं😇 #🙏 वृंदावन धाम #🌸 जय श्री कृष्ण
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