🕉️ ह्रीं तारायै नमः जय मां भवतारिणी 🌟 तारा
ब्रज के मंदिरों में भक्त को भगवान की प्रसादी माला पहनाने की परंपरा के पीछे श्रीनाथ जी और उनके एक अकिंचन वैष्णव भक्त की अनन्य प्रीति की कथा है।
अकबर के काल में, एक निर्धन ब्राह्मण भक्त प्रतिदिन श्रीनाथ जी के लिए माला लाता था। एक दिन जब माली के पास अंतिम माला बची थी, तब अकबर का सेनापति भी वहाँ आ पहुँचा। माला के लिए दोनों के बीच बोली लगी। भक्त ने भगवान के प्रति अपने प्रेम वश अपना घर-बार और सर्वस्व बेचकर वह माला खरीदी और श्रीनाथ जी को अर्पित की।
भक्त के इस चरम त्याग और भाव को देखकर श्रीनाथ जी इतने द्रवित हुए कि उन्होंने अपनी गर्दन झुका दी। जब पुजारियों ने भयभीत होकर कारण पूछा, तो प्रभु ने भक्त की व्यथा बताई। प्रभु के आदेश पर पुजारियों ने उस भक्त की संपत्ति और व्यवस्थाएँ पूर्ववत कीं, तब जाकर विग्रह की गर्दन सीधी हुई।
निष्कर्ष:
उसी दिन से यह प्रथा चली आ रही है कि भक्त की माला पहले विग्रह को स्पर्श कराई जाती है और फिर प्रभु के प्रेम के प्रतीक स्वरूप उसे वापस भक्त को ही पहना दी जाती है। यह परंपरा सिखाती है कि भगवान धन के नहीं, बल्कि भाव के भूखे हैं।
राधे राधे #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🙏 भक्ति 🙏
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