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#श्री हरि विष्णु
⚜️ शास्त्रों में आता है कि जिनका मिलना प्रारब्ध के अधीन है, उन स्त्री, पुत्र, परिवार, धन, भोजन आदि के मिलने में तो सन्तोष करना चाहिए; और जिनका मिलना नये पुरुषार्थ के अधीन हो, जैसे जप-तप, ध्यान, स्वाध्याय आदि में तथा परमात्म- तत्त्व को जानने के विषय में सन्तोष करना ही नहीं चाहिए। पारमार्थिक उन्नति की कोई सीमा नहीं है, अपनी स्थिति में सन्तोष करने से फिर आगे उन्नति रुक जाती है। जब तक अपने अलग अस्तित्व (व्यक्तित्व)-का भान होता है, तब तक तो सन्तोष करना ही नहीं चाहिए।*
*⚜️ कृतकृत्य (करना), ज्ञात- ज्ञातव्य, (जानना) और प्राप्त-प्राप्तव्य (पाना)— तीन बातें है; जब तक कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी रहता है, तब तक पूर्णता नहीं है। 'यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥' (गीता-6/22)। जिस लाभ की प्राप्ति के बाद उससे बढ़कर भी कोई लाभ हो सकता है, यह बात स्वप्न में भी मानने में नहीं आती है। जिस सुख से वह बड़े भारी दुःख से भी विचलित नहीं किया जा सके, जहाँ दुःख का स्पर्श ही नहीं हो, ऐसे अनिर्वचनीय सुख की प्राप्ति का मौका इस मनुष्य शरीर में मिला हुआ है।*
*⚜️ पारमार्थिक उन्नति में सन्तोष करने से धोखा हो जाता है, फिर उसकी आगे उन्नति रुक जाती है; और सांसारिक चीजों में सन्तोष नहीं करने से धोखा हो जाता है, उसकी कामनाएँ पूरी नहीं होने से वह दुःख पाता रहता है। यह मानव शरीर पारमार्थिक उन्नति के लिए ही मिला है, सुख-भोग, आराम, मान-बड़ाई के लिए नहीं है, इसलिए सांसारिक वस्तुओं आदि का मिलना अथवा नहीं मिलना इतने महत्त्व का नहीं है।*
*⚜️ एक मार्मिक बात है कि वर्तमान में मिलने वाला फल वर्तमान कर्मों का फल नहीं है। पिछले जन्मों में किये गये कर्मों के आधार पर, प्रारब्धानुसार वर्तमान में फल की प्राप्ति होती है, अभी वर्तमान में किये जाने वाले कर्मों का (क्रियमाण कर्म) फल आगे कभी मिलेगा; इसलिए फल की प्राप्ति में सन्तोष ही करना चाहिए। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।'*
*⚜️ मनुष्य शरीर में हमें ऐसे सुख के लिए प्रयत्न करना चाहिए, जिसमें दुःख का लेश भी न हो; मामूली सुख हमें नहीं लेना है। दुःख की अपेक्षा वाले साधारण सुख तो मनुष्येतर सभी योनियों में मिल जायेंगे, लेकिन ऐसा दुःख- रहित महान् आनन्द प्राप्त करने का मौका तो इस मनुष्य शरीर में ही है। 'दिन नहीं भूख रैन नहीं निद्रा, छिन-छिन व्याकुल होत हिया। चितवन मोरि तुमसे लागी पिया।' भोजन-पानी छोड़ने से भगवान् नहीं मिलते हैं; भगवत् प्राप्ति की लगन ऐसी लग जाय कि भूख-प्यास का भान ही न हो, तो भगवान् मिल जाते हैं।*
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