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प्रकृति के आगे इंसान का अहंकार हमेशा छोटा साबित हुआ है। इंसान कितनी भी तकनीक विकसित कर ले या ऊँची इमारतें बना ले, लेकिन प्रकृति के रौद्र रूप के सामने उसकी सारी शक्ति धरी की धरी रह जाती है।
जहाँ इंसान की सोच खत्म होती है, प्रकृति वहीं से अपना रूप दिखाना शुरू करती है। नदियाँ मोड़ना और जंगलों को काटना इंसान की भूल है, जिसका जवाब प्रकृति बाढ़ और आपदाओं से देती है। चित्रकूट, नेपाल और ओडिशा के दृश्य यही सिखाते हैं कि इंसान प्रकृति का मालिक नहीं, केवल एक हिस्सा है। जीत प्रकृति से नहीं, उसके साथ संतुलन में जीने में है।
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