सुशील मेहता
बलराम जयंती हलधर छठ
कृष्ण परमेश्वर हैं। वे समस्त अवतारों के एकमात्र स्रोत हैं। बलराम को उनका द्वितीय रूप माना जाता है। ये दोनों एक ही हैं और इनमें कोई अंतर नहीं है। अंतर केवल रंग का है। बलराम को भगवान कृष्ण का प्रथम भौतिक स्वरूप माना जाता है। वे संपूर्ण धार्मिक जगत के सर्वोच्च स्रोत और सच्चे धर्मगुरु हैं।
भगवान बलराम कृष्ण की सेवा के लिए चार अलग-अलग रूप धारण करते हैं। स्वयं बलराम ने लीलाओं में भगवान कृष्ण की सहायता की। उन्होंने चार अन्य रूपों की रचना में भी सहयोग दिया। ये चार रूप चतुर्व्यूह के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये चार रूप वासुदेव, प्रद्युमन, संकर्षण और अनिरुद्ध का वर्णन करते हैं। भगवान बलराम कृष्ण की संपूर्ण सृष्टि रचना का संचालन करते हैं और शेषदेव के रूप में विभिन्न तरीकों से भगवान कृष्ण की सेवा करते हैं। बलराम की कृपा प्राप्त किए बिना भगवान कृष्ण के पास पहुंचना बहुत कठिन था। जब भी भगवान कृष्ण प्रकट होते हैं, वे अपने साजो-सामान और सहयोगियों के साथ आते हैं। लगभग 5000 वर्ष पूर्व जब भगवान कृष्ण भौतिक पृथ्वी पर प्रकट हुए, तब सबसे पहले उनके नेतृत्व में बलराम थे। वे एक महान व्यक्तित्व हैं। उनकी असीम शक्ति अनेक राक्षसी सेनाओं को पराजित करने के लिए पर्याप्त है। यद्यपि वे अपने छोटे भाई कृष्ण की अलौकिक शक्तियों से भलीभांति परिचित हैं, फिर भी वे उन्हें कभी वनों में अकेला नहीं छोड़ते। भगवान कृष्ण के प्रति उनका प्रेम अकल्पनीय है। यही कारण है कि वे केवल बड़े भाई ही नहीं, बल्कि एक सच्चे मित्र भी हैं। कृष्ण के प्रति उनका प्रेम "शांत रस" को दर्शाता है।
बलराम जयंती हलधर छठ
हिन्दूओं के लिए यह दिन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। भाद्रपद की कृष्णा की षष्ठी को श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ। बलराम जी को बलदेव, बलभद्र, हलधारा, हलायुध और संस्कार के रूप में भी जाना जाता है। बलरामजी को शेषनाग का अवतार माना जाता है। कुछ लोग माता सीता का जन्म दिवस इसी तिथि को मानते हैं। बलरामजी का प्रधान शस्त्र हल तथा मूसल है। इसलिए उन्हें हलधर भी कहते हैं। उन्हीे के नाम पर इस पर्व का नाम हल षष्ठी कहा जाता है। हमारे देश के पूर्वी जिलों में इसे ललई छट भी कहते हैं। इस दिन महुए की दातुन करने का विधान है। इस व्रत में हल द्वारा जुला हुआ फल तथा अन्न का प्रयोग वर्जित होता है। इस दिन गाय का दूध दही का प्रयोग भी वर्जित है। भैंस का दूध व दही प्रयोग किया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीघार्यु और कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की कामना के उद्देश्य से पूरा दिन खड़े रहकर व्रत करती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत करने वाली उपासक पूरा दिन निर्जला व्रत रखती है. वहीं रात्रि को चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करती है. मध्य प्रदेश के मालवा प्रांत में व्रत करने वाली कन्याओं को उनके मामा द्वारा जल ग्रहण करवाकर व्रत तुड़वाया जाता है
#शुभ कामनाएँ 🙏