सरस्वती ओमँ शान्ती
#📿संतवाणी 🗣️ अमृतकथा प्रसंग 🟩🔘*
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*🏵️🔲 सृष्टि की अद्भुत रचना 🔲🏵️*
सृष्टि की रचना का कार्य अपने अंतिम चरण में था। अनंत आकाश में दिव्य प्रकाश फैला हुआ था। पर्वत अपने स्थान पर स्थापित हो चुके थे। नदियां कल-कल बहने लगी थीं। वृक्षों ने धरती को हरियाली से ढक दिया था। पक्षियों के मधुर स्वर गूंजने लगे थे और असंख्य जीव-जंतु अपने-अपने स्वभाव के अनुसार जीवन जीने लगे थे। देवगण इस अद्भुत सृष्टि को देखकर विस्मित थे। तभी ब्रह्मांड में एक गंभीर, करुणामयी और दिव्य वाणी गूंजी।
भगवान बोले, "हे देवगण, आज मैं तुम्हें अपनी सबसे अद्भुत, सबसे रहस्यमयी और सबसे अनमोल रचना का रहस्य दिखाने जा रहा हूं। ध्यान से देखो, क्योंकि आज जो बनने जा रहा है, वही आने वाले युगों का आधार होगा देवताओं ने श्रद्धा से अपने हाथ जोड़ लिए। उनमें से एक देव ने विनम्रता से कहा, "प्रभु, आपकी हर रचना अद्भुत है।
हिमालय की ऊंचाई, सागर की गहराई, नदियों की पवित्रता, वृक्षों की छाया, पशु-पक्षियों का जीवन—सब आपकी अनुपम कला का प्रमाण हैं। इससे अधिक अद्भुत और क्या हो सकता है?" भगवान मुस्कुराए और बोले, "अभी तुमने मेरी सबसे अनमोल रचना देखी ही नहीं। आज जो बनेगा, वही पूरी सृष्टि का रक्षक भी होगा और विनाश का कारण भी बन सकता है। उसी के कर्म तय करेंगे कि यह संसार स्वर्ग बनेगा या नरक।"
इतना कहकर भगवान धीरे-धीरे धरती की ओर बढ़े। उन्होंने अपने करकमलों को भूमि पर रखा और अत्यंत प्रेम से कहा, "हे पवित्र धरती, तुमने असंख्य बीजों को अंकुरित किया है। तुमने वृक्षों को जन्म दिया, पर्वतों को संभाला और जीवन को पोषित किया है। आज अपनी सबसे पवित्र मिट्टी मुझे सौंपो, क्योंकि मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना का सृजन करने जा रहा हूं।"
धरती माता ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, "प्रभु, यह मिट्टी आपकी ही है। मैं तो केवल आपकी शक्ति का माध्यम हूं। यदि मेरी गोद की यह धूल आपकी महान रचना का आधार बने, तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए और क्या हो सकता है?" यह कहते ही धरती की गोद से अत्यंत कोमल, सुगंधित और तेजस्वी मिट्टी स्वयं भगवान के हाथों में आ गई।
भगवान ने उस मिट्टी को अत्यंत प्रेम से गूंथा। उसमें पांचों तत्वों का संतुलन मिलाया। पृथ्वी की स्थिरता, जल की शीतलता, अग्नि का तेज, वायु की गति और आकाश की अनंतता उसमें समाहित कर दी। फिर उन्होंने अपनी दिव्य चेतना का अंश उसमें प्रवाहित किया। देवगण आश्चर्य से यह अद्भुत दृश्य देख रहे थे। कुछ ही क्षणों बाद भगवान ने अपनी हथेली उस आकृति के मस्तक पर रखी और कहा, "उठो मानव, आज से तुम्हें जीवन प्राप्त हुआ।"
जैसे ही यह वचन पूर्ण हुआ, मिट्टी की वह प्रतिमा जीवित हो उठी। उसने पहली बार आंखें खोलीं। पहली सांस ली। उसके हृदय की धड़कन पूरे ब्रह्मांड में गूंज उठी। उसने सबसे पहले भगवान के चरणों में प्रणाम किया। देवताओं ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था। भगवान बोले, "हे देवगण, यह है मेरी समस्त सृष्टि की सबसे अनमोल कृति। इसे मैंने केवल बल नहीं दिया, बुद्धि भी दी है। इसे केवल शरीर नहीं दिया, विवेक भी दिया है। इसे केवल जीवन नहीं दिया, बल्कि कर्म चुनने की स्वतंत्रता भी दी है।"
एक देवता के मन में जिज्ञासा जागी। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा, "प्रभु, यदि यह आपकी सबसे श्रेष्ठ रचना है, तो आपने इसे मिट्टी से ही क्यों बनाया? इसे सोने से भी बनाया जा सकता था। चांदी से भी बनाया जा सकता था। लोहे जैसी मजबूत धातु से भी तो इसका निर्माण संभव था।"
भगवान मुस्कुराए। उन्होंने पास पड़ी एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और बोले, "हे देव, बताओ क्या तुमने कभी सोने में जीवन अंकुरित होते देखा है?" देवता ने सिर झुकाकर कहा, "नहीं प्रभु।" भगवान ने फिर पूछा, "क्या चांदी में कभी कोई बीज उगा है?" देवता बोले, "कभी नहीं प्रभु।" भगवान ने तीसरा प्रश्न किया, "क्या लोहे की कठोर चट्टान से कभी कोई पौधा निकला है?" देवता ने उत्तर दिया, "ऐसा तो कभी संभव ही नहीं।"
भगवान ने तब अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, "यही कारण है कि मैंने मनुष्य को मिट्टी से बनाया। क्योंकि जीवन केवल मिट्टी में जन्म लेता है। बीज उसी में अंकुरित होते हैं। वृक्ष उसी से फलते-फूलते हैं। फूल उसी में खिलते हैं। अन्न उसी से उत्पन्न होता है। मिट्टी केवल शरीर नहीं बनाती, वह जीवन को जन्म देती है। मिट्टी सहना जानती है, देना जानती है और बिना किसी अभिमान के सबका भार उठाना जानती है।"
फिर भगवान ने मानव की ओर देखते हुए कहा, "स्मरण रखना, तुम्हारा जन्म चाहे कितना भी महान क्यों न हो, तुम्हारी शुरुआत मिट्टी से हुई है और अंत भी मिट्टी में ही होगा। यदि तुम अपनी मिट्टी को भूल गए, तो अपने अस्तित्व को भी भूल जाओगे। लेकिन यदि तुम मिट्टी का सम्मान करोगे, विनम्र रहोगे, सेवा करोगे और जीवन को सृजन में लगाओगे, तो तुम मेरे सबसे प्रिय बनोगे।"
इतने में एक छोटा-सा बीज हवा से उड़कर भगवान के चरणों के पास आ गिरा। भगवान ने उसे उसी मिट्टी में दबा दिया। कुछ ही क्षणों में वहां एक नन्हा अंकुर फूट पड़ा। भगवान बोले, "देखो देवगण, यही अंतर है। सोना केवल चमक देता है। चांदी केवल मूल्य देती है। लोहा केवल शक्ति देता है। लेकिन मिट्टी जीवन देती है। इसलिए जिसने अपनी मिट्टी से प्रेम करना सीख लिया, उसने सृष्टि के सबसे बड़े रहस्य को जान लिया।"
देवताओं की आंखें श्रद्धा से भर आईं। उन्होंने एक स्वर में कहा, "प्रभु, आज हमें समझ आ गया कि आपकी सबसे महान रचना केवल मनुष्य नहीं, बल्कि वह मिट्टी है जिससे मनुष्य बना है। उसी में जीवन है, उसी में विनम्रता है और उसी में सृजन की अनंत शक्ति है।"
भगवान ने अंत में मानव को आशीर्वाद देते हुए कहा, "जब तक तुम अपनी मिट्टी, अपने माता-पिता, अपने कर्म और अपने संस्कारों का सम्मान करोगे, तब तक मेरी कृपा तुम पर बनी रहेगी। लेकिन जिस दिन तुम अभिमान में अपनी जड़ों को भूल जाओगे, उसी दिन तुम्हारी शक्ति क्षीण होने लगेगी। इसलिए सदैव याद रखना जो अपनी मिट्टी को नहीं भूलता, वही जीवन का सच्चा अर्थ समझ पाता है। यही मेरी सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य है।
*🧡🍃🟨 ॐ शांति 🟨🍃🧡*