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- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩💥 गर्भोदक सागर का अलौकिक ब्रह्मांडीय रहस्य: पाञ्चरात्र आगमों के आलोक में प्रद्युम्न व्यूह का दिव्य विलास! 💥 🛑 क्या आप जानते हैं कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर का वह 'गर्भोदक सागर' साधारण जल नहीं, बल्कि साक्षात भगवान के शुद्ध-सत्त्वमय श्रीविग्रह का दिव्य स्वेद (ऊर्जा-जल) है? जानिए पाञ्चरात्र आगमों की वह गुप्त सृष्टि-प्रक्रिया, जिसे आज तक बहुत कम लोग समझ पाए हैं! 🛑 सनातन पाञ्चरात्र आगमों—विशेषकर सात्वत संहिता, जयाख्य संहिता, अहिर्बुध्न्य संहिता और पाद्म संहिता—में भगवान नारायण के 'चतुर्व्यूह' (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) द्वारा ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति और उनके संचालन का अत्यंत सूक्ष्म व वैज्ञानिक प्रतिपादन मिलता है। आइए, श्रीवैष्णव आचार्यों और आगम संहिताओं के गूढ़ प्रमाणों के साथ 'गर्भोदक सागर' और 'प्रद्युम्न व्यूह' के इस परम पावन विलास का दर्शन करते हैं। 🌌 1. कारण सागर से ब्रह्माण्डों का प्राकट्य (संकर्षण से प्रद्युम्न की ओर) पाञ्चरात्र आगमों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में: * कारणार्णवशायी (महाविष्णु / संकर्षण व्यूह): कारण सागर में योगनिद्रा में स्थित होते हैं। उनके रोम-कूपों से जब अनन्त ब्रह्माण्ड-गोलक (Cosmic Golden Eggs) बुदबुदों की भांति बाहर निकलते हैं, तब वे ब्रह्माण्ड सर्वथा शून्य, अचेतन और घोर अन्धकार से घिरे होते हैं। * प्रद्युम्न व्यूह का अन्तःप्रवेश: सात्वत संहिता के अनुसार, उन अचेतन ब्रह्माण्डों को चैतन्य और आधार देने के लिए परात्पर परब्रह्म अपने 'प्रद्युम्न' (Pradyumna Vyuha) रूप में प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर 'गर्भोदकशायी' (हिरण्यगर्भाण्डशायी) बनकर प्रवेश करते हैं। 🌊 2. गर्भोदक सागर का निर्माण: यह जल किस तत्त्व का है? यह कोई पृथ्वी का भौतिक जल (H_2O) नहीं है! जयाख्य और सात्वत संहिताओं में इस जल के प्राकट्य और तत्त्व का अत्यंत विस्मयकारी वर्णन है: * शुद्ध-सत्त्वमय 'अपाम्रस' (Divine Sweat/Essence): जब प्रद्युम्न व्यूह ब्रह्माण्ड के शून्य गर्भ में प्रवेश करते हैं, तो वे अपनी योगमाया और शुद्ध-सत्त्वमय (अप्राकृत त्रिगुणातीत) श्रीविग्रह से सृष्टि-रचना का 'ईक्षण' (संकल्प) करते हैं। इस परम तपोमय संकल्प और श्रम-लीला से भगवान के दिव्य श्रीअंगों से एक अलौकिक, तेजोमय अमृत-तुल्य स्वेद (जल) प्रवाहित होता है। * ब्रह्माण्ड के आधे भाग का भराव: यह दिव्य जल इतना अपार होता है कि यह प्रत्येक अण्डाकार ब्रह्माण्ड के निचले ५०% (आधे भाग) को पूर्ण रूप से भर देता है। इसी कारण इसे 'गर्भोदक सागर' (Garbhodaka Ocean) कहा जाता है—अर्थात् 'ब्रह्माण्ड के गर्भ में स्थित दिव्य जल'। * जल का तत्त्व: यह जल 'कारण-जल' का ही सूक्ष्म सघन रूप (Causal Liquid Energy) है, जो समस्त १४ लोकों के जीवों के सूक्ष्म शरीरों, उनके संचित कर्मों और प्रकृति के २४ तत्वों को अपने भीतर धारण करने की पूर्ण सामर्थ्य रखता है। 🐍 3. सहस्र दिव्य वर्षों का योगनिद्रा शयन (The Cosmic Incubation) गर्भोदक सागर के निर्माण के पश्चात् प्रद्युम्न भगवान: * अपने ही अंश अनन्त शेषनाग की सुखद शैया पर आरूढ़ होते हैं। * वे इस अप्राकृत जल पर १००० दिव्य वर्षों (1,000 Celestial Years) तक 'योगनिद्रा' में विश्राम करते हैं। > आगम रहस्य: यह शयन कोई निद्रा या आलस्य नहीं है, बल्कि 'ब्रह्माण्डीय उद्भवन' (Cosmic Incubation) है। इन १००० दिव्य वर्षों में भगवान जीवों के अनादि कर्म-संस्कारों को जाग्रत करते हैं और पूरे ब्रह्माण्ड के १४ लोकों के निर्माण का सूक्ष्म ब्लूप्रिंट (सृष्टि-संकल्प) तैयार करते हैं। 🪷 4. नाभि-कमल और ब्रह्मा जी का प्राकट्य जब वह १००० दिव्य वर्षों की अवधि पूर्ण होती है, तब: * हिरण्मय कमल का प्राकट्य: भगवान प्रद्युम्न की नाभि से एक दिव्य, सहस्त्र-दल युक्त, सुवर्ण के समान देदीप्यमान कमल का नाल (Stem) गर्भोदक सागर को चीरता हुआ ऊपर की ओर बढ़ता है। * ब्रह्मा जी की उत्पत्ति: उसी कमल के कर्णिका (पुष्प) पर चतुर्मुख ब्रह्मा जी (समष्टि जीव रूप) का प्राकट्य होता है। * अज्ञान से ज्ञान तक: ब्रह्मा जी जब घोर अन्धकार में अपने अस्तित्व को नहीं जान पाते, तब भगवान प्रद्युम्न ही उन्हें अंतःप्रेरणा देकर 'तप' का निर्देश देते हैं और वेदों तथा १४ लोकों के निर्माण (विसर्ग) का संपूर्ण सामर्थ्य प्रदान करते हैं। 🔱 परम निष्कर्ष गर्भोदक सागर कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि सनातन आगमों का वह सर्वोच्च ब्रह्माण्ड-विज्ञान (Vedic Cosmology) है, जो बताता है कि परमात्मा केवल बाहर से सृष्टि को नहीं देखते, बल्कि वे स्वयं प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर उतरकर, अपने ही श्रीअंगों के जल से उसका आधार बनते हैं और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपनी गोद में धारण करते हैं। जो जीव इस गर्भोदकशायी प्रद्युम्न व्यूह का नित्य स्मरण करता है, उसके संसार-समुद्र के समस्त भय नष्ट हो जाते हैं! 🙏जय श्रीमन्नारायण! 🚩 #🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩1110
- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩💥 नरक लोक का वास्तविक ब्रह्मांडीय रहस्य: स्थिति, विज्ञान और यातना भोगने का शास्त्रीय मर्म! 💥 🛑 क्या 'नरक' केवल डराने के लिए गढ़ी गई एक काल्पनिक कथा है, या ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Justice) का एक अचूक आयाम? जानिए श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और आगमों के आलोक में नरक लोक की वास्तविक भौगोलिक स्थिति और चेतना का विज्ञान! 🛑 आज के आधुनिक युग में बहुत से लोग तर्क देते हैं कि "नरक जैसा कुछ नहीं होता, जो है इसी जन्म में है।" परंतु सनातन ब्रह्मांड-विज्ञान (Vedic Cosmology) इसे अत्यंत सटीक और व्यवस्थित रूप से स्पष्ट करता है। जैसे किसी राज्य में नियम तोड़ने वालों के लिए 'कारागार' (Jail) एक वास्तविक व्यवस्था है, वैसे ही ब्रह्मांड में अधर्म के फल की शुद्धि के लिए 'नरक' एक वास्तविक लोक है। आइए, श्रीमद्भागवत महापुराण (पंचम स्कंध, अध्याय २६), विष्णु पुराण और गरुड़ पुराण के आधार पर नरक की स्थिति, उसके अधिष्ठाता और भोगने वाले 'शरीर' के रहस्य को समझते हैं। 📍 1. नरक की वास्तविक ब्रह्मांडीय स्थिति (Exact Cosmic Location) श्रीमद्भागवत महापुराण के ५वें स्कंध (अध्याय २६, श्लोक ५) में राजा परीक्षित के पूछने पर श्री शुकदेव जी नरक की सटीक स्थिति बताते हैं: अन्तराले त्रिजगत्यास्तु पश्चाद्भागे वरेण च। अधस्ताद् भूमेश्चोपरिष्टाच्च जलाद् यमलोकः स्थितः॥ (श्रीमद्भागवत ५.२६.५) 🌸 सरल हिंदी भावार्थ: "यमलोक (नरक लोक) तीनों लोकों के दक्षिण भाग में, भूमण्डल (पाताल सहित पृथ्वी मंडल) के नीचे और गर्भोदक सागर के जल के ऊपर—इन दोनों के बीच के अंतराल (मध्यवर्ती भाग) में स्थित है।" भौगोलिक नक्शा (Location Map): १४ लोकों का विभाजन: ऊपर ७ ऊर्ध्व लोक (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) और भूलोक के नीचे ७ पाताल लोक (अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल) हैं। पाताल के ठीक नीचे और गर्भोदक सागर के ऊपर: सातवें पाताल (पाताल लोक) के नीचे तथा गर्भोदक सागर के अप्राकृत जल के ठीक ऊपर के मध्यवर्ती भाग में 'नरक लोक' (यमलोक) स्थित है। दिशा: यह ब्रह्मांड के दक्षिण भाग (South Direction) में स्थित है। अधिष्ठाता: यहाँ साक्षात भगवान सूर्य के पुत्र धर्मराज (यमराज) अपने पार्षदों के साथ निवास करते हैं, जो भगवान नारायण के आज्ञाकारी महाजन हैं और निष्पक्ष रूप से कर्मों का न्याय करते हैं। 🧠 2. नरक में यातना कौन भोगता है? (आत्मा, जीवात्मा या शरीर?) यह सबसे गूढ़ और तात्विक प्रश्न है। साधारणतः लोग सोचते हैं कि "आत्मा तो न जलती है, न कटती है (गीता २.२३), तो नरक में कष्ट किसे होता है?" शास्त्रों और आगमों का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट है: १. शुद्ध आत्मा (Atman): आत्मा निर्लिप्त, शुद्ध और सच्चिदानंद है; वह न पाप करती है, न फल भोगती है। २. स्थूल शरीर (Physical Body): मृत्यु के समय यह पांचभौतिक शरीर यहीं पृथ्वी पर जलकर राख या मिट्टी हो जाता है। ३. यातना देह (Yatana Deha / सूक्ष्म शरीर का आवरण): मृत्यु के समय जब जीवात्मा (सूक्ष्म शरीर + मन, बुद्धि, अहंकार) स्थूल शरीर से निकलती है, तो यमदूतों के अधिकार में आते ही उसे कर्मों के अनुसार एक विशेष शरीर प्राप्त होता है, जिसे शास्त्रों में 'यातना देह' कहा जाता है। यातना देह की विशेषता: यह शरीर केवल कष्ट और वेदना को तीव्र रूप से अनुभव करने के लिए बना होता है। इसे काटा जाए, खौलते तेल में डाला जाए या अग्नि में झोंका जाए—यह पीड़ा पूरी तरह महसूस करता है, परंतु स्थूल शरीर की तरह नष्ट होकर 'मरता' नहीं है! जब तक पाप कर्मों का दंड पूरा नहीं होता, यह शरीर पीड़ा सहता रहता है। ⚖️ 3. नरक का उद्देश्य: 'सजा' नहीं, बल्कि 'शुद्धिकरण' (Rehabilitation, Not Revenge) नरक का विधान किसी बदले की भावना से नहीं, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण (Purification) के लिए है: जैसे एक स्वर्णकार (सुनार) सोने में लगे मैल को हटाने के लिए उसे आग की भट्टी में तपाता है ताकि सोना शुद्ध हो सके, ठीक वैसे ही जब कोई जीव भयंकर अत्याचार, अधर्म और पाप करता है, तो उसके चित्त पर चढ़े तामसिक संस्कारों के मैल को धोने के लिए नरक की व्यवस्था है। श्रीमद्भागवत में २८ प्रकार के प्रमुख नरकों (जैसे तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुंभीपाक, असिपत्रवन आदि) का वर्णन है, जो भिन्न-भिन्न प्रकार के अपराधों (जैसे पराई संपत्ति हड़पना, जीवों पर अकारण अत्याचार करना, माता-पिता/गुरु का अपमान) के शोधन के लिए निर्धारित हैं। 🌸 4. नरक से बचने का एकमात्र अचूक मार्ग शास्त्र कहते हैं कि नरक के भयानक दंडों से बचने के लिए कठिन प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है। यदि मनुष्य जीवित रहते हुए सच्चे हृदय से भगवान की शरण ले ले और उनके नाम का आश्रय ले, तो यमराज के दूत उसके पास फटक भी नहीं सकते: हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः॥ (बृहन्नारदीय पुराण) (भावार्थ: जैसे अनजाने में भी छू जाने पर अग्नि जला देती है, वैसे ही जाने-अनजाने लिया गया भगवान श्रीहरि का नाम जीव के समस्त पापों को भस्म कर देता है और उसे नरक के भय से सदा के लिए मुक्त कर देता है।) 🔱 परम निष्कर्ष नरक कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि सनातन ब्रह्मांडीय न्याय-प्रणाली (Cosmic Law of Karma) का एक अनिवार्य अंग है। जो जीव धर्म और करुणा के मार्ग पर चलता है, उसके लिए यह ब्रह्मांड आनंदमय है; और जो अधर्म के मार्ग पर चलता है, प्रकृति उसे शुद्ध करने के लिए उचित स्थान देती है। परंतु जो जीव 'श्रीमन्नारायण' / 'महादेव' के पावन नामों का निरंतर स्मरण करता है, उसके लिए नरक के द्वार बंद हो जाते हैं और साक्षात वैकुंठ व शिवलोक के द्वार खुल जाते हैं! जय धर्मराज! हर हर महादेव! जय श्रीमन्नारायण! #🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🔊सुन्दर कांड🕉️1211
- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 🌊 'कारण सागर' का तात्विक स्वरूप एवं भगवान संकर्षण का दिव्य शयन सनातन आगम परंपरा में 'कारण सलिल' (Causal Ocean) और चतुर्व्यूह के द्वितीय विग्रह भगवान संकर्षण का संबंध अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक है। यह कोई साधारण भौतिक जल का समुद्र नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय उत्पत्ति और महाप्रलय का परम आधार है। ✨ १. कारण सागर क्या है और किस तत्व से निर्मित है? कारण सलिल पंचमहाभूतों में आने वाले स्थूल जल (H_2O) से सर्वथा भिन्न है: 🔹 मूल-प्रकृति की साम्यावस्था: सृष्टि-पूर्व अवस्था में जब त्रिगुणात्मक प्रकृति (सत्त्व, रजस, तमस) में कोई विक्षोभ नहीं होता, तब वह शून्य नहीं होती। वह एक असीम, निराकार और द्रवीभूत ऊर्जा के रूप में स्थित होती है। इसी अव्यक्त स्थिति को 'कारण सलिल' कहा जाता है। 🔹 द्रव संज्ञा का दार्शनिक रहस्य: जिस प्रकार जल किसी भी पात्र के अनुसार ढल सकता है, उसी प्रकार इस कारण-द्रव में समस्त ब्रह्मांडों, महत-तत्व, अहंकार और जीवों को बीजरूप में धारण करने की असीम क्षमता होती है। 🔹 संधि-तत्व: जयाख्य संहिता के अनुसार, यह शुद्ध सृष्टि (अप्राकृत आध्यात्मिक आकाश) और मिश्र सृष्टि (भौतिक जगत) के मध्य का दिव्य विभाजक आवरण है। ✨ २. भगवान के संकल्प (लब्धि) से कारण सागर का प्राकट्य परब्रह्म वासुदेव सृष्टि के निमित्त और उपादान दोनों हैं। वे अपनी संकल्प-शक्ति से ही इस असीम सलिल का विस्तार करते हैं: 🔹 स्रिृक्षा और स्पंदन: प्रलय-काल के अंत में जब भगवान में सृष्टि रचने की इच्छा (स्रिृक्षा) जागती है, तो उनकी परा-शक्ति में प्रथम स्पंदन होता है। ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ ॥ श्रीअहिर्बुध्न्य संहिता ॥ "ब्रह्म पूर्णमिदं शान्तं तरङ्गरहितोदधिः। तस्य शक्तिः परा ह्येषा सिसृक्षोन्मेषशालिनी॥" ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ भगवान अपनी अचित्-शक्ति पर जो प्रथम दृष्टिपात (ईक्षण) करते हैं, वही संकल्प-प्रभाव से द्रवीभूत होकर अनंत 'कारण सागर' के रूप में विस्तृत हो जाता है। ✨ ३. भगवान संकर्षण: कारण सागर के अधिष्ठाता एवं षड्गुण पांचरात्र चतुर्व्यूह क्रम में कारण सागर का सम्पूर्ण आधिपत्य भगवान संकर्षण के अधीन है: 🔹 ज्ञान और बल के विग्रह: भगवान के छह दिव्य गुणों में से संकर्षण ज्ञान और बल के प्रधान अधिष्ठान हैं: ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ ॥ श्रीअहिर्बुध्न्य संहिता (२.२५) ॥ "ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः। सङ्कर्षणादयो देवा गुणैर्द्विद्विभिरन्विताः॥" ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ यहाँ 'बल' का अर्थ है अशेष-धृति-सामर्थ्य—अर्थात अनंत कोटि ब्रह्मांडों, काल और प्रलय के वेग को बिना किसी श्रम के अपने भीतर धारण करने की असीम शक्ति। 🔹 'सम् + कर्ष' का गूढ़ अर्थ: 'कर्षण' का अर्थ है खींचना या समेटना। प्रलय के समय संकर्षण ही समस्त जीवों को उनके सूक्ष्म कर्म-संस्कारों सहित प्रकृति के बंधनों से समेटकर अपने भीतर आश्रय देते हैं: ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ ॥ श्रीसात्वत संहिता ॥ "सर्वं संकर्षते यस्मात् संकर्षण उच्यते।" ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 🔹 योग-निद्रा और शेष-शयन: कारण सागर में भगवान संकर्षण 'अनंत शेष' पर योग-निद्रा में शयन करते हैं। यह शेषशय्या कोई भिन्न सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं संकर्षण का ही आधारभूत 'धृति' स्वरूप है। ✨ ४. क्या महाप्रलय में कारण सागर विद्यमान रहता है? जब ब्रह्मा जी की १०० वर्ष की आयु पूर्ण होने पर प्राकृतिक महाप्रलय आता है, तब कारण सागर की स्थिति: 🔹 स्थूल जगत का लय: चौदह भुवन, पंचमहाभूत, इंद्रियां, अहंकार और महत-तत्व अपने-अपने कारणों में विलीन होते हुए मूल-प्रकृति में समा जाते हैं। 🔹 अव्यक्त बीज-अवस्था: कारण सागर कभी सर्वथा नष्ट या शून्य नहीं होता। यह अपनी सक्रिय कार्य-अवस्था को समेटकर भगवान संकर्षण के उदर में 'सूक्ष्म बीज-अवस्था' (Dormant State) में लीन रहता है। जब तक संकर्षण की योग-निद्रा का काल रहता है, यह सलिल भगवान की योग-माया के अधीन सुरक्षित रहता है, जिससे आगामी कल्प में पुनः सृष्टि का उद्भव हो सके। ✨ दार्शनिक संदेश कारण सागर सृष्टि का वह दिव्य गर्भ है जिसमें भगवान संकर्षण अपने 'बल' गुण से सम्पूर्ण जगत को सुरक्षित रखते हैं। उनके श्वास छोड़ने पर ब्रह्मांड प्रकट होते हैं और श्वास भीतर खींचने पर पुनः इसी कारण-सलिल में समा जाते हैं। जीवात्मा का परम कल्याण इस भव-प्रपंच से निकलकर परब्रह्म के चरणों में शरणागति (प्रपत्ति) प्राप्त करने में ही है। #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 🙏 जय श्रीमन्नारायण 🙏1515
- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🔊सुन्दर कांड🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गुरु महिमा😇413
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- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🔊सुन्दर कांड🕉️ #🙏आध्यात्मिक गुरु🙏 #🤗जया किशोरी जी🕉️1838
- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #👏भगवान विष्णु😇 #🙏 भजन संग्रह 🎵 #🎵 राधा-कृष्ण भजन 🙏 #🙏चारधाम यात्रा🛕1720
- 🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #😇सोमवार भक्ति स्पेशल🌟 #🔱बम बम भोले🙏 #🔱हर हर महादेव7056
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