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✍️ अनसुनी शायरी - मेरे टूटने का ज़िम्मेंदारि मेरा जौहरी ही है, | उसी की ज़िद थी कि मुझे और तराशा जाए | 07020 ` मेरे टूटने का ज़िम्मेंदारि मेरा जौहरी ही है, | उसी की ज़िद थी कि मुझे और तराशा जाए | 07020 ` - ShareChat