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#जगत गुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का आध्यात्मिक ज्ञान
जगत गुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का आध्यात्मिक ज्ञान - (3 ] 30(2{6( अग्नि लगा दिया जब लम्बा , फूंक दिया उस ठांही। ಇಜ. पुराण उठा फिर पंडित आए, पीछे गरूड़ पढ़ाई। प्रेत शिला पर जा विराजे , पितरों पिण्ड भराई। बहुर श्राद्ध खाने कूं आए, काग भए कलि माहीं| जै सतगुरू की संगति करते , सकल कर्म कटि जाई। अमरपुरी पर आसन होता , जहाँ धूप न छांई। सूक्ष्मवेद (तत्वज्ञान ) में तथा चारों वेदों तथा इन चारों वेदों के सारांश गीता जी में स्पष्ट किया है कि आन - उपासना (जेसे श्राद्ध कर्म) नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये शास्त्रों में वर्णित न होने से मनमाना आचरण है जो गीता अध्याय १६ श्लोक २३, २४ में व्यर्थ बताया है। सर्व हिन्दू समाज यह आन - उपासना (श्राद्ध, पितर पूजा ) करते हैं जिससे भक्ति सफलता नहीं होती। जिस कारण से नरकगामी होते हैं तथा प्रेत-पितर, पशु-पक्षी आदि के शरीरों में महाकष्ट उठाते हैं। (3 ] 30(2{6( अग्नि लगा दिया जब लम्बा , फूंक दिया उस ठांही। ಇಜ. पुराण उठा फिर पंडित आए, पीछे गरूड़ पढ़ाई। प्रेत शिला पर जा विराजे , पितरों पिण्ड भराई। बहुर श्राद्ध खाने कूं आए, काग भए कलि माहीं| जै सतगुरू की संगति करते , सकल कर्म कटि जाई। अमरपुरी पर आसन होता , जहाँ धूप न छांई। सूक्ष्मवेद (तत्वज्ञान ) में तथा चारों वेदों तथा इन चारों वेदों के सारांश गीता जी में स्पष्ट किया है कि आन - उपासना (जेसे श्राद्ध कर्म) नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये शास्त्रों में वर्णित न होने से मनमाना आचरण है जो गीता अध्याय १६ श्लोक २३, २४ में व्यर्थ बताया है। सर्व हिन्दू समाज यह आन - उपासना (श्राद्ध, पितर पूजा ) करते हैं जिससे भक्ति सफलता नहीं होती। जिस कारण से नरकगामी होते हैं तथा प्रेत-पितर, पशु-पक्षी आदि के शरीरों में महाकष्ट उठाते हैं। - ShareChat