GM क्रांति: खेत से लैब तक 🚜🔬 — क्या आप जानते हैं कि जीएम फसलों की खेती 1996 के 1.7 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2016 में करीब 185.1 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच चुकी थी, जो जैव-प्रौद्योगिकी की तेज़ी और किसानों द्वारा अपनाने की बड़ी तस्वीर बयां करती है? यही नहीं, वैज्ञानिक समुदाय का समग्र निष्कर्ष है कि वर्तमान बाजार में उपलब्ध जीएम खाद्य पदार्थ सामान्य खाद्य पदार्थों से मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक जोखिम नहीं दिखाते; फिर भी हर नए जीएम उत्पाद को केस-बाय-केस परीक्षण की ज़रूरत रहती है — यही वैज्ञानिक सतर्कता का मूल नियम है। हाल के वर्षों में सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं रहकर जीन-एडिटेड जानवरों और उपभोक्ता-उन्मुख सब्ज़ियों जैसे परिणाम भी सामने आए हैं — उदाहरण के लिए सूअरों में बुखार-प्रतिरोधी जीन-एडिटिंग और किराने में आने वाली जीन-एडिटेड सलाद पत्तियाँ बताती हैं कि CRISPR जैसी तकनीकें रोग-नियंत्रण और स्वाद/पोषण सुधार दोनों में त्वरित प्रभाव दे सकती हैं; परन्तु सामाजिक-नैतिक स्वीकृति, नियामक ढाँचा और अर्थव्यवस्था पर इसका असर भी वैज्ञानिक-मौडलिंग और नीतिगत चर्चा के बिना नहीं समझा जा सकता। जीएम और जीन-एडिटिंग का वैज्ञानिक आधार—DNA में लक्षित परिवर्तन, जीन ट्रांसफर या संशोधन—नियमित प्रयोगशाला विधियों और बायोसेफ़्टी प्रोटोकॉल से जुड़ा है, इसलिए लाभ-हानि का विश्लेषण डेटा, रिस्क असेसमेंट और पारदर्शी निगरानी पर ही टिकता है। वैज्ञानिक/नैतिक परिप्रेक्ष्य अपनाते हुए कहें तो: “प्रौद्योगिकी अवसर देती है, पर समाज और विज्ञान मिलकर ही जोखिम कम कर सकते हैं” — यही संतुलित दृष्टिकोण हमें सुरक्षित नवाचार की राह दिखाएगा। #जीएम #GeneEditing #कृषि #साइंस 🚀🌾 @gm_bgm_2023 @Rajurajaravar@gmail.com @shivkumar1978yadav@gmail.com.................... @akibali5470@gmail.com @thiyasrikalai@gmail.com #gm #gm #gm #gm #gm


