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#दोहा
दोहा - ४४ तिनका कबहुँ ना निन्दिये , जो पाँवन तर होय ,कबहुँ उड़ी आँरिवन FలI99 पडे़ , तो पीर घनेरी कबीर का मानना था कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी आधार पर कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए इसमें वह कुछ इस तरह कहते हैं कि अगर वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो असहनीय दर्द भी दे भी सकता है ४४ तिनका कबहुँ ना निन्दिये , जो पाँवन तर होय ,कबहुँ उड़ी आँरिवन FలI99 पडे़ , तो पीर घनेरी कबीर का मानना था कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी आधार पर कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए इसमें वह कुछ इस तरह कहते हैं कि अगर वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो असहनीय दर्द भी दे भी सकता है - ShareChat