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#✍🏻गुरु नानक देव जी का इतिहास 📖
✍🏻गुरु नानक देव जी का इतिहास 📖 - गुरु नानक देव जी का इतिहास सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु के रूप में है , जिनका जन्म १४८१ में में हुआ ' तलवंडी (पाकिस्तान ) था। उन्होंने समाज में समानता, भाईचारे और सभी के लिए एक ईश्वर पर विश्वास का संदेश दिया। उन्होंने ३० वर्ष की 3/g# आध्यात्मिक यात्रा शुरू की और भारत व दुनिया के कई हिस्सों में यात्रा कर अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। गुरु नानक ने '्लंगर' की प्रथा शुरू की, जो समानता का प्रतीक है। उनका निधन १५३१ में करतारपुर में हुआ, जहाँ उन्होंने एक समुदाय की स्थापना की थी। गुरु नानक देव जी के जीवन के मुख्य पड़ाव जन्मः १५ अप्रैल , १४६१ को वर्तमान पाकिस्तान में तलवंडी नामक स्थान पर हुआ, जिसे अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। शिक्षाः छोटी उम्र में ही उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह की शिक्षाएँ प्राप्त कीं। आध्यात्मिक जागरणः ३० वर्ष की आयु में , उन्हें एक गहन आध्यात्मिक अनुभव हुआ, जिसके बाद उन्होंने अपनी यात्राएँ शुरू कीं। यात्राएँ (उदासी): उन्होंने भारत और मध्य एशिया के कई धार्मिक केंद्रों का दौरा किया, जिसमें मक्का, तिब्बत , कश्मीर और बंगाल शामिल थे। शिक्षाएँ: उन्होंने जाति, लिंग और धर्म के भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों की समानता पर जोर दिया। उन्होंने पाखंड, मूर्ति पूजा और अंधविश्वासों का विरोध किया। प्रमुख सिद्धांतः नाम जपनाः ईश्वर का नाम जपना। कीरत करनाः ईमानदारी से काम करके जीवन यापन करना। वंड छकनाः ज़रूरतमंदों के साथ अपनी कमाई बाँटना | लंगरः उन्होंने सभी के लिए एक साथ भोजन करने की 'लंगर' प्रथा शुरू की, जो समानता और दान का प्रतीक है। गुरु नानक देव जी का इतिहास सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु के रूप में है , जिनका जन्म १४८१ में में हुआ ' तलवंडी (पाकिस्तान ) था। उन्होंने समाज में समानता, भाईचारे और सभी के लिए एक ईश्वर पर विश्वास का संदेश दिया। उन्होंने ३० वर्ष की 3/g# आध्यात्मिक यात्रा शुरू की और भारत व दुनिया के कई हिस्सों में यात्रा कर अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। गुरु नानक ने '्लंगर' की प्रथा शुरू की, जो समानता का प्रतीक है। उनका निधन १५३१ में करतारपुर में हुआ, जहाँ उन्होंने एक समुदाय की स्थापना की थी। गुरु नानक देव जी के जीवन के मुख्य पड़ाव जन्मः १५ अप्रैल , १४६१ को वर्तमान पाकिस्तान में तलवंडी नामक स्थान पर हुआ, जिसे अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। शिक्षाः छोटी उम्र में ही उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह की शिक्षाएँ प्राप्त कीं। आध्यात्मिक जागरणः ३० वर्ष की आयु में , उन्हें एक गहन आध्यात्मिक अनुभव हुआ, जिसके बाद उन्होंने अपनी यात्राएँ शुरू कीं। यात्राएँ (उदासी): उन्होंने भारत और मध्य एशिया के कई धार्मिक केंद्रों का दौरा किया, जिसमें मक्का, तिब्बत , कश्मीर और बंगाल शामिल थे। शिक्षाएँ: उन्होंने जाति, लिंग और धर्म के भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों की समानता पर जोर दिया। उन्होंने पाखंड, मूर्ति पूजा और अंधविश्वासों का विरोध किया। प्रमुख सिद्धांतः नाम जपनाः ईश्वर का नाम जपना। कीरत करनाः ईमानदारी से काम करके जीवन यापन करना। वंड छकनाः ज़रूरतमंदों के साथ अपनी कमाई बाँटना | लंगरः उन्होंने सभी के लिए एक साथ भोजन करने की 'लंगर' प्रथा शुरू की, जो समानता और दान का प्रतीक है। - ShareChat