*सभी सत्संग प्रेमियों को प्रेम से राधे राधे 🙏🙏🌹🌹*
*आइए सत्संग आरंभ करे श्री जी की कृपा से🙏🙏🌹🦚*
हरि बोलो राम राम हरि बोलो राम राम....राम बोलो राम राम राम बोलो राम राम....हरि हरि राम राम...राम राम राम राम....हरि बोलो राम राम राम बोलो राम राम....हरि हरि राम राम हरि हरि राम राम....🙇♀️🙌
*भक्तों के भगवान....भगवान के प्यारे भक्त....श्री भक्त चरित्र*...🙇♀️
*परम पूज्य संत, भक्त श्री राधावल्लभ शरण जी महाराज (दंडवती बाबा)*🙇♀️
*क्रमशः से आगे....*
संत जन कहते है 🙇♀️पिछले कई जन्मों से जीव की यह यात्रा चली आ रही है किसी जन्म में किसी योनि में थे तो किसी जन्म में किसी योनि में थे यही जीव जो आज मनुष्य दिखाई दे रहा है मनुष्य शरीर जिसे मिला हुआ है यही जीव पहले के जन्मों में पशु पक्षी भी था कभी सुअर का भी शरीर मिला होगा इसे कभी कुत्ते बिल्ली का भी.... कभी कुछ बना होगा तो कभी कुछ बना होगा वही जो आज मनुष्य शरीर के रूप में दिखाई दे रहा है तो जो पूर्व के शरीरों के संस्कार थे वो इस मनुष्य शरीर में भी कभी कभी अपना संस्कार दिखाते है इसीलिए कभी बोलचाल से या हरकतों से क्रियाओं से मनुष्य ही पशु जैसा प्रतीत होता है चूंकि पिछले जन्मों के अच्छे बुरे संस्कार जोर मारते रहते है चाहे आज भले कोई मनुष्य हो तब भी.....लेकिन जो भक्त होते है उनकी यात्रा भी ऐसा कहा है संतो ने 🙇♀️सात जन्मों से तो चली आ रही ही होती है लेकिन उन सातों जन्मों में लगातार भक्त बनता मनुष्य ही है एक आधा जन्म कुछ समय के लिए भले मिल जाए पशु पक्षी का लेकिन वह बहुत थोड़े समय के लिए हुआ करता है और वो मिलता भी इस कारण से है कि कही किसी पशु पक्षी में यदि उस भक्त की आसक्ति हो गई हो तो.....जैसे श्री जड़ भरत जी जो थे जिनकी कथा भागवत जी में आती है उनकी आसक्ति एक जन्म में हिरण के बच्चे में हो गई थी तो बहुत थोड़े समय के लिए उन्हें हिरण का ही एक जन्म अपनी यात्रा के बीच में लेना पड़ा था.....यात्रा अर्थात जो उनकी मोक्ष की यात्रा चल रही थी चूंकि वे ज्ञान मार्गी थे इसी तरह से भक्त की भी यात्रा चलती है सात जन्मों की जिनमें से वैसे तो सभी जन्म उसे मनुष्य के ही मिलते है लेकिन बीच में कही आसक्ति हो जाए पशु पक्षी आदि में तो फिर थोड़े समय के लिए एक जन्म लग सकता है भक्त का भी मनुष्य से विलग योनि में अन्यथा तो सभी जन्म मनुष्य के ही मिलते है सातों.... तो जो भक्त होते है उनका मन अत्यंत ही निर्मल कोमल सरल होता है अर्थात कि कोई भी ऐसी लीला वार्ता कथा दर्शन कुछ भी उन्हें ऐसा मिलता है वर्तमान के जन्म में जो भगवान से संबंधित होता है तो भक्त झट से उस ओर आकर्षित हो जाता है जैसे श्री दंडवती बाबा ने जब बचपन में श्री कृष्ण की वह कालिया नाग नाथन लीला श्रवण की....अपनी मां के द्वारा तो सहज में ही उनका मन लीला के चिंतन में चला गया भक्ति के संस्कार पिछले जन्मों से आ रहे थे *सरल हृदय नहीं मन कुटिलाई*.... तो सरल हृदय में तुरंत उस लीला का स्फूर्ण होने लगा इसी से गोविंद अर्थात दंडवती बाबा को तीन दिनों तक गहन मूर्च्छा रही.....बेहोश रहे गोविंद जो उस समय मात्र सात वर्ष के ही थे तीन दिनों के बाद चौथे दिन अचानक अपने आप ही गोविंद को होश आया अर्थात वे जागे और उस समय उन्हें कोई ज्वर भी नहीं था बिल्कुल स्वस्थ थे लेकिन उठते ही अपनी मां से बोले गोविंद....कि मां आपने जो कथा सुनाई थी न वह सारा का सारा दृश्य मैने सपने में देखा साक्षात होते हुए वह सब जो आपने सुनाया मैने देखा मां भी सुनकर हतप्रभ रह गई कि इतना छोटा सा मेरा पुत्र और तीन दिनों तक बेहोशी की अवस्था में था इसे होश आया भी तो ये न तो कराह रहा है न रो रहा है न ही और कुछ केवल जागते ही ये तो उस लीला की बात कर रहा है जो मैने इसे कितने दिन पूर्व सुनाई थी मां के लिए बालक चाहे बहुत बड़ा अफसर हो जाए कलेक्टर हो जाए डॉक्टर इंजीनियर कुछ भी हो जाए या तो संत साधु ही हो जाए तब भी मां को उसमें केवल अपना बच्चा दिखाई देता है ये हर एक मां का सहज स्वभाव होता ही है शंकराचार्य जी की भी जननी होगी बड़े से बड़े किसी दंडी स्वामी जगद्गुरु की किसी सिद्ध की भी माता होगी जन्म देने वाली यदि वह भी केवल अपने बालक को ही उनमें देखा करती है वो ये जानती नहीं कि कितना बड़ा मेरा पुत्र हो गया या कितने बड़े पद पर है मेरा पुत्र
ये मां का सहज ही स्वरूप हुआ करता है तो गोविंद की माता कृष्णा देवी जी ने भी बिल्कुल यशोदा मैया की तरह से जैसे यशोदा मैया ने जब कृष्ण के मुख में सकल ब्रह्माण्ड के दर्शन किए थे तो यही बोली थी कि हे भगवान न जाने मेरे लाला के मुख में का का आलाय बलाय घुस गई 😁उन्हें ये स्मृति ही नहीं रही कि मेरा लाला भगवान है या भगवान हो भी सकता है वो तो केवल इतना मानती थी कि ये तो मेरो कनुआ है मेरो छोटो सो लाला है बाकी मां कुछ नहीं जानती
ये सभी माताओं के साथ होता है ठीक यही कृष्णा माता अर्थात गोविंद की माता भी सोचने लगी कि गोविंद ठीक रहे बस बच्चा है शायद इसीलिए ऐसा सब बोल रहा है कि मैने वो सब देखा जो आपने अर्थात मां में मुझे सुनाया मां ने बात आई गई सी कर दी इसीलिए ....लेकिन गोविंद के साथ जो कुछ भी हुआ वो कोई साधारण बात नहीं थी उनके लिए तो उनके आने वाले जीवन के लिए मानो एक विचित्र घटना ये घटित हुई थी उनके साथ अब गोविंद बार बार उसी छवि को देखते रहते जिसमें कालिया के फन पर कृष्ण नृत्य कर रहे थे जो उनके घर में थी छवि और मानो गोविंद ने मन ही मन ये तय कर लिया कि यही कृष्ण है जिन्हें उनके नेत्र खोज रहे थे बरसों से.....अब इन्हीं के लिए यह जीवन समर्पित होगा मेरा अब ये जीवन मेरा नहीं इन्ही का है मेरे लिए नहीं इन्ही के लिए है
बच्चे इस आयु में खेल खेलते है लेकिन गोविंद एकांत में बैठकर नेत्र बंद करके बार बार प्रयास करते कि वही लीला दर्शन मुझे फिर से हो पहले बिना प्रयास के दर्शन हुए थे उन्हें अब उसी के लिए गोविंद प्रयास करने लगे साधकों के लिए मानो शिक्षा दे रहे है दंडवती बाबा 🙇♀️ कि एक बार यदि स्वप्न में भी ऐसा कोई लीला दर्शन हो तो प्रयास करते रहना चाहिए कि बार बार उसी का दर्शन ध्यान में साधक कर सके बिना मतलब की संसारी बातों गतिविधियों का ध्यान चिंतन नहीं करना चाहिए साधक को जो अक्सर सभी किया करते है हो तब भी उन्हें हटाकर किसी न किसी लीला का कथा का दर्शन चिंतन ध्यान में करने का प्रयास करना चाहिए इसी से संसार के प्रति वैराग्य और भगवान के प्रति अनुराग बढ़ेगा.....मिलही न रघुपति बिनु अनुरागा भगवान बिना अनुराग के नहीं मिला करते ।
जारी रहेगी अब आगे की यह अनुपम चर्चा चिंतन के साथ ....कल के सत्र में श्री जी की कृपा से....🙇♀️🙌🙏
क्रमशः.....
*चिंतन मनन अवश्य कीजिए कृपया सभी साधक जन🙇♀️🙏*
*आज का भाव श्री जी के चरणो में निवेदन करते हुए सभी को प्रेम से राधे राधे 🙏🙏🌹🌹🙇♀️🙇♀️*
#༺꧁🙏🏼 जय श्री राधे कृष्णा ग्रुप *🙏🏼 ꧂༻


