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#आध्यात्मिक दृष्टिकोण #मेरी हृदय मेरी माँ #आध्यात्मिक_रचना
आध्यात्मिक_रचना - ये मन इतना मतवाला है कि कभी समझता ही नहीं कभी रुकता ही नहीं जीवन के नियमों और अनुशासनो तथा सत्य की बात को मानना इसे कठिन लगता है मन अपने ही बनाए पिंजरे में कैद होकर भी बाहर निकलने की चाह रखता है यही मन की द्वंद्वात्मक स्थिति है मनुष्य को बंधक बना 8! ये मन इतना मतवाला है कि कभी समझता ही नहीं कभी रुकता ही नहीं जीवन के नियमों और अनुशासनो तथा सत्य की बात को मानना इसे कठिन लगता है मन अपने ही बनाए पिंजरे में कैद होकर भी बाहर निकलने की चाह रखता है यही मन की द्वंद्वात्मक स्थिति है मनुष्य को बंधक बना 8! - ShareChat