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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ अयोध्याकाण्ड ☀️ दोहा ३१७☀️ पृष्ठ ३१८☀️ सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी । अवधि आस सम जीवनि जी की ॥ नतरु लखन सिय राम बियोगा । हहरि मरत सबलोग कुरोगा ॥१॥ वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधि की आशा के समान ही वह जीवन के लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सब लोग घबड़ा कर (हाय-हाय करके) मर ही जाते ॥१॥ रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ॥ भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो । राम प्रेम रसु कहि न परत सो ॥२॥ श्रीरामजी की कृपा ने सारी उलझन सुधार दी। देवताओं की सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओं में भर कर भाई भरत से मिल रहे हैं। श्रीरामजी के प्रेम का वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता ॥२॥ तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ॥ बारिज लोचन मोचत बारी।देखि दसा सुर सभा दुखारी॥३॥ तन, मन और वचन तीनों में प्रेम उमड़ पड़ा। धीरज की धुरी को धारण करने वाले श्रीरघुनाथजी ने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा (समाज) दुःखी हो गयी। मुनिगन गुर धुर धीर जनक से । ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥ जे बिरंचि निरलेप उपाए।पदुमपत्र जिमि जग जलजाए॥४॥ मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीर धुरन्धर जो अपने मनों को ज्ञानरूपी अग्नि में सोने के समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजी ने निर्लेप ही रचा और जो जगरूपी जल में कमल के पत्ते की तरह ही (जगत्‌ में रहते हुए भी जगत् से अनासक्त) पैदा हुए ॥४॥ दो०- तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार । भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥३१७॥ वे भी श्रीरामजी और भरतजी के उपमा रहित अपार प्रेम को देख कर वैराग्य और विवेक सहित तन, मन, वचन से उस प्रेम में मग्न हो गये ॥३१७॥ #सीताराम भजन
सीताराम भजन - गोरखपुर (7197 , प्रभु  करि कृपा पाँबरी  दीन्ही| स्रादर भरत सीस धरि लीन्ही Il गोरखपुर (7197 , प्रभु  करि कृपा पाँबरी  दीन्ही| स्रादर भरत सीस धरि लीन्ही Il - ShareChat