ShareChat
click to see wallet page
search
#प्रेम
प्रेम - विरह का ताप ऐसा है कि फूलों की पंखुड़ियों से बना कोमल बिछौना भी शरीर से चिपक जाता है मानो दुख का स्पर्श हर ओर फैला हो यादों के सफ़र में करवटें बदलते-बदलते मन थक जाता है और पसीना भी उसी पीड़ा का प्रतीक लगता है। वे प्रेम और बहने बनकर सौन्दर्य के प्रतीक हैं लेकिन विफलता भी मुरझा और पीड़ाओं के क्षणों में वे जाते हैं क्योंकि योग्यता की कसौटी पर स्पष्टता स्वयं ही झलक जाती है तो फिर दिखावटी आदर सत्कार की आवश्यकता ही क्या है? विरह का ताप ऐसा है कि फूलों की पंखुड़ियों से बना कोमल बिछौना भी शरीर से चिपक जाता है मानो दुख का स्पर्श हर ओर फैला हो यादों के सफ़र में करवटें बदलते-बदलते मन थक जाता है और पसीना भी उसी पीड़ा का प्रतीक लगता है। वे प्रेम और बहने बनकर सौन्दर्य के प्रतीक हैं लेकिन विफलता भी मुरझा और पीड़ाओं के क्षणों में वे जाते हैं क्योंकि योग्यता की कसौटी पर स्पष्टता स्वयं ही झलक जाती है तो फिर दिखावटी आदर सत्कार की आवश्यकता ही क्या है? - ShareChat