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Devuthni ekadashi - devuthni ekadashi se judi 2 kath #devuthni ikadasi
devuthni ikadasi - वृंदा के श्राप से विष्णु बने ` के शालग्राम f चार महीने पाताल में रहकर लौटते हैं भगवान पत्यर থািন দুযণা ৯ जालंथर नाम के राक्षस न मुताबिक  वामन पुराण का कहना है कि सतयुग र्में भगवान विष्णु इंद्र को हराकर तीनों लोक जीत लिए। शिवजी ने उस तीन कदम जमीन ने वामन अवतार लेकर राजा बलि देवताओं का राज्य देने को कहा लेकिन वो नहीं माना।  दान में मांगी थी। फिर अपना कद बढ़ाकर दो कदम में शिवजी ने उससे युद्ध किया लेकिन उसके पास पत्नी  पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग  नाप लिया। तीसरा पैर रखने वृंदा के सतीत्व की ताकत थी। इस कारण जालंधर को  के लिए जगह नहीं बची तो बलि अपना सिर आगे कर जी ने जालंथर का ही चिष्णु  हराना मुाश्केल था। तब दिया। रूप लिया और चृंदा के साथ रहकर उसका सतीत्व तोड़  दिया। जिसस जालधर मर गया। सिर पर पैर रखते ही बलि पाताल में चले गए। भगवान वृंदा को ये पता चला तो उन्होने  ने खुश होकर उन्हें पाताल का राजा बना दिया और चिष्णु को पत्थर बनने विष्णु का श्राप दिया। लक्ष्मी जी ने भगवान को श्राप वरदान मांगने को कहा। विनती की। विष्णु को से छुटाने के लिए वृंदा से वृंदा ने  बलि ने कहा आप मेरे महल में रहिए॰ भगवान ने ये हमेशा अपने पास रहने की शर्त पर मुक्ति दी और खुद सती हा गई। वरदान दे दिया, लेकिन लक्ष्मी जी ने बलि को भाई Tat] को वैकुंठ ले गईं। जिस दिन और  3 चृंदा की राख से जो पौधा बना  बनाया লমাতী  तुलसी विष्णु-लक्ष्मी वैकुंठ गए उस दिन ये ही एकादशी थी। विष्गु  বুলমী  नेभी को हमशा शालग्राम रूप नाम दिया। दिपा। বুলমী- নন ম में साथ रहन का चरदान शालग्राम विवाह की परंपरा चल रही है।  वृंदा के श्राप से विष्णु बने ` के शालग्राम f चार महीने पाताल में रहकर लौटते हैं भगवान पत्यर থািন দুযণা ৯ जालंथर नाम के राक्षस न मुताबिक  वामन पुराण का कहना है कि सतयुग र्में भगवान विष्णु इंद्र को हराकर तीनों लोक जीत लिए। शिवजी ने उस तीन कदम जमीन ने वामन अवतार लेकर राजा बलि देवताओं का राज्य देने को कहा लेकिन वो नहीं माना।  दान में मांगी थी। फिर अपना कद बढ़ाकर दो कदम में शिवजी ने उससे युद्ध किया लेकिन उसके पास पत्नी  पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग  नाप लिया। तीसरा पैर रखने वृंदा के सतीत्व की ताकत थी। इस कारण जालंधर को  के लिए जगह नहीं बची तो बलि अपना सिर आगे कर जी ने जालंथर का ही चिष्णु  हराना मुाश्केल था। तब दिया। रूप लिया और चृंदा के साथ रहकर उसका सतीत्व तोड़  दिया। जिसस जालधर मर गया। सिर पर पैर रखते ही बलि पाताल में चले गए। भगवान वृंदा को ये पता चला तो उन्होने  ने खुश होकर उन्हें पाताल का राजा बना दिया और चिष्णु को पत्थर बनने विष्णु का श्राप दिया। लक्ष्मी जी ने भगवान को श्राप वरदान मांगने को कहा। विनती की। विष्णु को से छुटाने के लिए वृंदा से वृंदा ने  बलि ने कहा आप मेरे महल में रहिए॰ भगवान ने ये हमेशा अपने पास रहने की शर्त पर मुक्ति दी और खुद सती हा गई। वरदान दे दिया, लेकिन लक्ष्मी जी ने बलि को भाई Tat] को वैकुंठ ले गईं। जिस दिन और  3 चृंदा की राख से जो पौधा बना  बनाया লমাতী  तुलसी विष्णु-लक्ष्मी वैकुंठ गए उस दिन ये ही एकादशी थी। विष्गु  বুলমী  नेभी को हमशा शालग्राम रूप नाम दिया। दिपा। বুলমী- নন ম में साथ रहन का चरदान शालग्राम विवाह की परंपरा चल रही है। - ShareChat