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अल्फ़ाज़ - नाम परिंदा रख देने से क्या कोई परिंदा हो जाता है, ज़़िंदा ज़िंदा कह देने से क्या मुर्दा ज़िंदा हो जाता है। सीरत बदली ना आदत उसकी, ना बदला तौर फ़रेबी का, महज़ नज़र झुका लेने से क्या कोई शर्मिंदा हो जाता है। Digital Quill 57u 010 नाम परिंदा रख देने से क्या कोई परिंदा हो जाता है, ज़़िंदा ज़िंदा कह देने से क्या मुर्दा ज़िंदा हो जाता है। सीरत बदली ना आदत उसकी, ना बदला तौर फ़रेबी का, महज़ नज़र झुका लेने से क्या कोई शर्मिंदा हो जाता है। Digital Quill 57u 010 - ShareChat