वो लैला थी… वो मजनूँ था,
इश्क़ उनका किस्सा नहीं—इबादत था।
दुनिया जीत गई दोनों को जुदा करके,
पर मोहब्बत… आज भी ज़िंदा है हर दास्तान में।
वो मिल न सके—ये उनकी हार नहीं थी,
क्योंकि कुछ इश्क़ मुकम्मल होकर भी अधूरे लगते हैं…
और कुछ अधूरे होकर भी अमर हो जाते हैं।
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