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#✒️ કવિની કલમ
✒️ કવિની કલમ - মিত্ী ম পক্কল जी लो ये पल प्यार के मेरे साथ सनम, न जाने कब ये चेहरे मिट्टी में मिल जाएँ। वक़्त की रेत मुट्ठी से फिसलती जाती है, न जाने कब ये साँसें राहों में थम जाएँ। आज जो पास हैं, उन्हें दिल से लगा लो तुम, क्या पता कल ये मौसम फिर बदल जाएँ। मोहब्बत अधूरी न रहे दिल की किताबों में , कौन जाने कल ये किस्से कहीं खो जाएँ। चलो हँसकर जी लें हर धड़कन का ये सफ़र, न जाने कब हम ख़ामोशी में ढल जाएँ। लिखित प्रकाश पंडित মিত্ী ম পক্কল जी लो ये पल प्यार के मेरे साथ सनम, न जाने कब ये चेहरे मिट्टी में मिल जाएँ। वक़्त की रेत मुट्ठी से फिसलती जाती है, न जाने कब ये साँसें राहों में थम जाएँ। आज जो पास हैं, उन्हें दिल से लगा लो तुम, क्या पता कल ये मौसम फिर बदल जाएँ। मोहब्बत अधूरी न रहे दिल की किताबों में , कौन जाने कल ये किस्से कहीं खो जाएँ। चलो हँसकर जी लें हर धड़कन का ये सफ़र, न जाने कब हम ख़ामोशी में ढल जाएँ। लिखित प्रकाश पंडित - ShareChat