कानून की अदालत हो या जिंदगी की... सही वक्त पर सही कदम न उठाया जाए, तो सिर्फ पछतावा हाथ लगता है।
अदालतें सबूत मांगती हैं और रिश्ते कदर। लेकिन जब दोनों का वक्त निकल जाए, तो न अपील काम आती है, न दलील।
आपकी इस पर क्या राय है? क्या वाकई हर चीज की एक 'एक्सपायरी डेट' होती है? मुझे नीचे कमेंट्स में ज़रूर बताएं। 👇💬
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