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#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - मौजूद हुजूम-ए-शहर तो था तमाशा देखने को, मगर किसी के हाथ न उठे उसे बचाने को। सैकड़ों आंखें थीं वहां, पर सब पथराई हुई थीं, के बुत बन गए सब, एक इंसान को बचाने को। पत्थर रहीं धड़कनें उसे, चिल्लाता रहा दिल, पुकारती ज़ालिम ज़माना खडा रहा बस तमाशा बनाने को। पर वो भीड़़, वो बेबसी और वो खामोश सिसकियां, कोई ज़िंदा न था वहां, ज़ैद को बचाने को? क्या मौजूद हुजूम-ए-शहर तो था तमाशा देखने को, मगर किसी के हाथ न उठे उसे बचाने को। सैकड़ों आंखें थीं वहां, पर सब पथराई हुई थीं, के बुत बन गए सब, एक इंसान को बचाने को। पत्थर रहीं धड़कनें उसे, चिल्लाता रहा दिल, पुकारती ज़ालिम ज़माना खडा रहा बस तमाशा बनाने को। पर वो भीड़़, वो बेबसी और वो खामोश सिसकियां, कोई ज़िंदा न था वहां, ज़ैद को बचाने को? क्या - ShareChat