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- ꧁༒♛🅜︎🅞︎🅗︎🅘︎🅝︎🅘︎ ♛༒꧂#🙏🏻मोहिनी एकादशी🪔 #🤗शुभकामनाएं वीडियो📱 #🌞 Good Morning🌞 #जय विष्णु भगवान🙏🙏162174
- 🇮🇳𝄟͢ᶦ―ᷟ⃞᪵🇸꯭ǐ𝖑꯭ẽɳ꯭𝘁𝄟⃝Queen༎͓͢♥️꯭᪵᪳❰᭄#🪔मोहिनी एकादशी📿 #🙏🏻मोहिनी एकादशी🪔 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🙏🏻 मेरे भगवान 🙏🏻1K2K
- sn vyas#💐🪷🌺🌹 मोहिनी एकादशी 🌹🌺🪷💐 #🙏🏻मोहिनी एकादशी🪔 पद्म पुराण के उत्तर खंड में वर्णित मोहिनी एकादशी और परम वैष्णव राजा रुक्मांगद की कथा एकादशी व्रत के प्रति अनन्य निष्ठा, त्याग और भगवान की कृपा का अलौकिक उदाहरण है। १. राजा रुक्मांगद का एकादशी नियम अयोध्या के सत्यवादी और धर्मात्मा राजा रुक्मांगद भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपने राज्य में यह कड़ा नियम लागू कर रखा था कि ८ वर्ष के बालक से लेकर ८० वर्ष के वृद्ध तक, राज्य का हर नागरिक एकादशी का व्रत अनिवार्य रूप से रखेगा। जो व्रत नहीं रखता था, उसे राज्य से निष्कासित कर दिया जाता था। राजा के इस नियम के प्रभाव से उनके राज्य का कोई भी जीव नरक नहीं जाता था, जिससे यमलोक सूना होने लगा। २. मोहिनी का प्रादुर्भाव और राजा पर मोहिनी का प्रभाव यमराज और देवराज इंद्र राजा रुक्मांगद का व्रत भंग कराने के लिए व्याकुल हो उठे। उन्होंने राजा की परीक्षा लेने के लिए 'मोहिनी' नाम की एक अत्यंत रूपवती अप्सरा को पृथ्वी पर भेजा। मोहिनी वन में राजा रुक्मांगद को मिली और अपने सौंदर्य से उन्हें मोहित कर लिया। राजा ने जब उससे विवाह का प्रस्ताव रखा, तो मोहिनी ने एक शर्त रखी: "मैं आपसे विवाह तभी करूंगी, जब आप जीवन भर मेरी हर आज्ञा मानेंगे और कभी मेरी बात को नहीं टालेंगे।" कामासक्त होकर राजा ने मोहिनी की शर्त स्वीकार कर ली। ३. एकादशी व्रत का संकट और मोहिनी की क्रूर माँग कुछ समय बाद जब कार्तिक या वैशाख मास की मोहिनी एकादशी आई, तो राजा रुक्मांगद हमेशा की तरह व्रत की तैयारी करने लगे। मोहिनी ने तुरंत राजा को उनकी प्रतिज्ञा की याद दिलाई और कहा कि आज वे एकादशी का व्रत न रखें और उसके साथ भोजन करें। जब राजा ने अपने प्राणों से प्रिय एकादशी व्रत को तोड़ने से साफ़ मना कर दिया, तो मोहिनी ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार एक अत्यंत क्रूर विकल्प रखा: "या तो आप आज एकादशी का व्रत तोड़कर मेरे साथ भोजन करें, या फिर अपने इकलौते और प्रिय पुत्र 'धर्मांगद' का सिर काटकर मुझे भेंट कर दें।" ४. रानी संध्यावली और पुत्र धर्मांगद का त्याग राजा रुक्मांगद भयंकर धर्मसंकट में फँस गए। एक तरफ उनका धर्म (व्रत) था और दूसरी तरफ उनके पुत्र का जीवन। जब राजा की महारानी संध्यावली और राजकुमार धर्मांगद को यह बात पता चली, तो वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। राजकुमार धर्मांगद ने स्वयं हँसते हुए अपने पिता से कहा: "हे पिताश्री! मेरा यह नाशवान शरीर तो एक दिन नष्ट हो जाएगा, किंतु यदि आपका एकादशी व्रत टूट गया तो आपका धर्म नष्ट हो जाएगा। आप निसंकोच मेरा सिर काट दीजिए, परंतु एकादशी का नियम मत तोड़िए।" महारानी संध्यावली ने भी अपने हाथों से तलवार राजा के हाथ में थमा दी। ५. भगवान विष्णु का प्रादुर्भाव और चमत्कार अत्यंत भारी मन से, केवल धर्म और एकादशी व्रत की रक्षा के लिए जैसे ही राजा रुक्मांगद ने अपने पुत्र धर्मांगद की गर्दन पर तलवार चलाई, उसी क्षण साक्षात भगवान श्री हरि (विष्णु) प्रकट हो गए। भगवान विष्णु ने राजा का हाथ थाम लिया और तलवार को पुष्पमाला में बदल दिया। मोहिनी तुरंत अपने वास्तविक अप्सरा रूप में आकर लज्जित हुई और देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की। भगवान विष्णु ने राजा रुक्मांगद की अनन्य भक्ति, उनके पुत्र धर्मांगद के त्याग और महारानी के धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर राजा रुक्मांगद, उनके पूरे परिवार तथा राज्य की प्रजा को सदेह (शरीर सहित) बैकुंठ धाम ले जाने का वरदान दिया। कथा का सार पद्म पुराण का यह प्रसंग सिखाता है कि एकादशी व्रत का पालन केवल एक उपवास नहीं, बल्कि धर्म और भक्ति की पराकाष्ठा है। जो मनुष्य किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म और एकादशी व्रत का निष्काम भाव से पालन करता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं और अंत में उसे अपना परम पद प्रदान करते हैं।818
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