ShareChat
click to see wallet page
search
Kavita #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
❤️Love You ज़िंदगी ❤️ - ಭI अनिल कुमार Araiae এিনা কা লাপ ठमन स्व॰ श्री॰एमःएल॰ श्रीवास्तव  মণা रेल विशाग  कार्यरत ٢٩ ٥٢ শাল  गल आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओँ அ7 স বমলাহ মুক্রাহিন  मतलव परस्ती आर नफरता की यही हालत रहीनात lal' मिट जायंगी एक दिन हन्सानों कोषत्तियाा हम जो ख्वाब देख रहे ह बह कभी पूरा नरी होगा हाँ हमारे बनाये बमोँ से लाशों में तबदील हा जायगी जिन्चगिया ।  और जब कोई देखने वाला ही नही रहगा लाको " तो क्या करेंगे अकेले लेके इतनी ढेर सारा खुनियाँ । ना तुम कुछ लेकर जाओगे न हम कुछ लेकर जापेग  यहीं थी यहों रही है यहीं रह जायेगी यहाँ को दुनिय। कर भी ताकृत से दुनिया का कोई खुदा न बन पाया। चाह  आयीों और आकर चली ग्यी सिकन्दर और रावण ती हस्त्या यह कोई घर्म नहीं कहता इसा इंसान सेदरकर सब कुछ जानकर भी आदमी कर रहा हे गल्तियों पर गल्तिया। सिंदूर कहीं माँकी कोख सूनी हुई कहों बहिन का उनड़ा ह। क्या विल बदलने केलिए काफी नही हःबेटी को सिसकिया। गिर चुके हैं खुद से खुद ही नजरें नहो मिला पाते  इतना गुस्ताखियँ खुदा जाने कहाँ ले जाकर छोड़ेंगी हमको हमारी यह इतनी तरक्की की कि खुद ही खोज लिये अपनी बर्बादी के रास्ते। दिनों दिन मौत की तरफ ले जा रहे हैं हमारे बने कुएँ और खाइयाँ। हम याद तब भी कर रहे हैं हमें याद करने वाला नी नहों बचेगा कोई हमारी लाशों के साथ दफन हो जायेंगी हमारी परछाइयाँ। आओ प्रेम और शान्ति से हम सब मिलजुल कर रह। वह बुराइयाँ ।  जिन बातों से हमारा सर झुके छोड़ दे वह बाते अनिल कुमार श्रीवास्तव  अमन " बरली नि॰ ३८३  स्वरूप नगर चाहबाई 66, 5 ಊ೨೯೧೯೦೯೮ೇ ೨೦ಭರ =5^68635635 कल्याप काव्यन कमलाकर ಭI अनिल कुमार Araiae এিনা কা লাপ ठमन स्व॰ श्री॰एमःएल॰ श्रीवास्तव  মণা रेल विशाग  कार्यरत ٢٩ ٥٢ শাল  गल आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओँ அ7 স বমলাহ মুক্রাহিন  मतलव परस्ती आर नफरता की यही हालत रहीनात lal' मिट जायंगी एक दिन हन्सानों कोषत्तियाा हम जो ख्वाब देख रहे ह बह कभी पूरा नरी होगा हाँ हमारे बनाये बमोँ से लाशों में तबदील हा जायगी जिन्चगिया ।  और जब कोई देखने वाला ही नही रहगा लाको " तो क्या करेंगे अकेले लेके इतनी ढेर सारा खुनियाँ । ना तुम कुछ लेकर जाओगे न हम कुछ लेकर जापेग  यहीं थी यहों रही है यहीं रह जायेगी यहाँ को दुनिय। कर भी ताकृत से दुनिया का कोई खुदा न बन पाया। चाह  आयीों और आकर चली ग्यी सिकन्दर और रावण ती हस्त्या यह कोई घर्म नहीं कहता इसा इंसान सेदरकर सब कुछ जानकर भी आदमी कर रहा हे गल्तियों पर गल्तिया। सिंदूर कहीं माँकी कोख सूनी हुई कहों बहिन का उनड़ा ह। क्या विल बदलने केलिए काफी नही हःबेटी को सिसकिया। गिर चुके हैं खुद से खुद ही नजरें नहो मिला पाते  इतना गुस्ताखियँ खुदा जाने कहाँ ले जाकर छोड़ेंगी हमको हमारी यह इतनी तरक्की की कि खुद ही खोज लिये अपनी बर्बादी के रास्ते। दिनों दिन मौत की तरफ ले जा रहे हैं हमारे बने कुएँ और खाइयाँ। हम याद तब भी कर रहे हैं हमें याद करने वाला नी नहों बचेगा कोई हमारी लाशों के साथ दफन हो जायेंगी हमारी परछाइयाँ। आओ प्रेम और शान्ति से हम सब मिलजुल कर रह। वह बुराइयाँ ।  जिन बातों से हमारा सर झुके छोड़ दे वह बाते अनिल कुमार श्रीवास्तव  अमन " बरली नि॰ ३८३  स्वरूप नगर चाहबाई 66, 5 ಊ೨೯೧೯೦೯೮ೇ ೨೦ಭರ =5^68635635 कल्याप काव्यन कमलाकर - ShareChat