Men Life – अधूरे सपने
अधूरे सपनों का बोझ उठाए फिरता हूँ,
मैं हँसता कम… ज़्यादा अंदर ही अंदर मरता हूँ…
कभी चाहा था आसमान को छू लेना,
आज ज़मीन पे ही खुद को समझौते में धरता हूँ…
मेरे भी कुछ ख्वाब थे — रंगीन, बेपरवाह,
पर अब हर ख्वाब से पहले घर का ख़र्चा करता हूँ…
कोई पूछे हाल तो बस “ठीक हूँ” कह देता हूँ,
क्योंकि दर्द बताकर भी क्या… किसको असर करता हूँ…
कभी अपने लिए जीने का मन करता है,
पर हर बार अपनों के लिए खुद को ही दरकिनार करता हूँ…
ये जो कहते हैं — “तूने पाया ही क्या है?”
उन्हें क्या पता… मैं हर रोज़ खुद को ही हारता हूँ…
अधूरे सपने अब भी आँखों में जिंदा हैं,
बस फर्क इतना है…
अब मैं उन्हें पूरा करने से ज़्यादा,
छुपाने की कोशिश करता हूँ… 💔
#❤️जीवन के सीख #💘जख्मी दिल🖤

