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❤️Love You ज़िंदगी ❤️ - स्वर्ग और वैकुंठ में क्या अंतर है? @thounknownworld स्वर्ग वह जगह है जहां इंद्र आदि देवता निवास करते हैं। मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति हर किसी को नहीं होती। हालांकि स्वर्ग जाने के बाद आत्मा को फिर से आना पड़ता है, भले ही उसे स्वर्ग में कितना ही सुख क्यों मृत्युलोक  न मिले। वहीं वैकुंठ वह स्थान है जहां भगवान  ఇ और माता लक्ष्मी का निवास  वैकुंठ " होता है। किसी आत्मा को प्राप्त होता है तो उसे फिर जन्म-मरण के में नहीं फंसना पड़ता। वैकुंठ की प्राप्ति तभी होती है जब व्यक्ति चक्र आध्यात्मिक रूप से ऊंचाइयां छू चुका हो। वैकुंठ का दर्जा स्वर्ग से कहीं अधिक है। वैकुंठ स्वर्ग से भी ऊपर है और भौतिक जगत के दायरे में ये नहीं आता। जबकि स्वर्ग भौतिक सृष्टि में ही विराजमान है। 9 अस्थायी (पुण्य खत्म तो वापसी): स्वर्ग में आप तब तक रहते हैं जब स्वर्ग  जैसे ही पुण्य समाप्त होते हैं, आत्मा को दोबारा  तक आपके पुण्य शेष हैं।  1 मृत्यु लोक (पृथ्वी) पर जन्म लेना पड़ता है।  स्थायी (हमेशा के लिए मुक्ति): यहाँ जाने वाली आत्मा जन्मन्मृत्यु वैकुंठ के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेती है। वैकुंठ जाने के बाद जीव को 8 वापस संसार में नहीं आना पड़ता। स्वर्गः यहाँ इंद्रियों के सुख (जैसे अप्सराएँ, अमृत, अच्छे भोजन) प्रधान होते हैं। यह एक तरह का " पुरस्कार" है जो अच्छे कर्मो के बदले मिलता है। 0 वैकुंठः यहाँ केवल भक्ति और परम आनंद है। यहाँ कोई कुंठा (चिंता या ईर्ष्या) नहीं होती। भक्त यहाँ भगवान के साथ एकात्म होकर रहता है। @theunknownworlo निष्कर्षः स्वर्ग एक " शानदार होटल" की तरह है जहाँ आप तब तक रह सकते हैं जब तक आपकी "जेब में पुण्य के पैसे" हैं, जबकि वैकुंठ वह "अपना घर" है जहाँ जाने के बाद आपको फिर कहीं और भटकना नहीं पड़ता। स्वर्ग और वैकुंठ में क्या अंतर है? @thounknownworld स्वर्ग वह जगह है जहां इंद्र आदि देवता निवास करते हैं। मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति हर किसी को नहीं होती। हालांकि स्वर्ग जाने के बाद आत्मा को फिर से आना पड़ता है, भले ही उसे स्वर्ग में कितना ही सुख क्यों मृत्युलोक  न मिले। वहीं वैकुंठ वह स्थान है जहां भगवान  ఇ और माता लक्ष्मी का निवास  वैकुंठ " होता है। किसी आत्मा को प्राप्त होता है तो उसे फिर जन्म-मरण के में नहीं फंसना पड़ता। वैकुंठ की प्राप्ति तभी होती है जब व्यक्ति चक्र आध्यात्मिक रूप से ऊंचाइयां छू चुका हो। वैकुंठ का दर्जा स्वर्ग से कहीं अधिक है। वैकुंठ स्वर्ग से भी ऊपर है और भौतिक जगत के दायरे में ये नहीं आता। जबकि स्वर्ग भौतिक सृष्टि में ही विराजमान है। 9 अस्थायी (पुण्य खत्म तो वापसी): स्वर्ग में आप तब तक रहते हैं जब स्वर्ग  जैसे ही पुण्य समाप्त होते हैं, आत्मा को दोबारा  तक आपके पुण्य शेष हैं।  1 मृत्यु लोक (पृथ्वी) पर जन्म लेना पड़ता है।  स्थायी (हमेशा के लिए मुक्ति): यहाँ जाने वाली आत्मा जन्मन्मृत्यु वैकुंठ के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेती है। वैकुंठ जाने के बाद जीव को 8 वापस संसार में नहीं आना पड़ता। स्वर्गः यहाँ इंद्रियों के सुख (जैसे अप्सराएँ, अमृत, अच्छे भोजन) प्रधान होते हैं। यह एक तरह का " पुरस्कार" है जो अच्छे कर्मो के बदले मिलता है। 0 वैकुंठः यहाँ केवल भक्ति और परम आनंद है। यहाँ कोई कुंठा (चिंता या ईर्ष्या) नहीं होती। भक्त यहाँ भगवान के साथ एकात्म होकर रहता है। @theunknownworlo निष्कर्षः स्वर्ग एक " शानदार होटल" की तरह है जहाँ आप तब तक रह सकते हैं जब तक आपकी "जेब में पुण्य के पैसे" हैं, जबकि वैकुंठ वह "अपना घर" है जहाँ जाने के बाद आपको फिर कहीं और भटकना नहीं पड़ता। - ShareChat