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#✍️ साहित्य एवं शायरी
✍️ साहित्य एवं शायरी - रिश्तों की धूप-छाँव से आज़ाद हो गए, अब तो हमें भी सारे सबक याद हो गए, आबादियों में होते हैं बर्बाद कितने लोग, हम देखने गए तो बर्बाद हो गए, मैं पर्वतों से लड़ता रहा और चन्द लोग, गीली ज़मीन खोद कर फरहाद हो गए, बैठे हुए भेड़िए हैं कीमती सोफों पर जंगल के लोग शहर में आबाद हो गए, लफ़्ज़ों के हेर फेर का धंधा भी ख़ूब है, जाहिल हमारे शहर में उस्ताद हो गए। रिश्तों की धूप-छाँव से आज़ाद हो गए, अब तो हमें भी सारे सबक याद हो गए, आबादियों में होते हैं बर्बाद कितने लोग, हम देखने गए तो बर्बाद हो गए, मैं पर्वतों से लड़ता रहा और चन्द लोग, गीली ज़मीन खोद कर फरहाद हो गए, बैठे हुए भेड़िए हैं कीमती सोफों पर जंगल के लोग शहर में आबाद हो गए, लफ़्ज़ों के हेर फेर का धंधा भी ख़ूब है, जाहिल हमारे शहर में उस्ताद हो गए। - ShareChat