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हज़ारों सालों से मनुष्य एक ही प्रश्न का उत्तर खोज रहा है— "मैं कौन हूँ?" उपनिषदों में ऋषियों ने इस प्रश्न का उत्तर 'महावाक्यों' के रूप में दिया है। महावाक्य केवल शब्द नहीं, बल्कि परम सत्य के द्वार हैं। आज हम अद्वैत वेदांत के उन चारों महावाक्यों को समझेंगे, जो बताते हैं कि आप और यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही हैं। यहां आपसे तात्पर्य आपका शरीर नहीं बल्कि वह परम चैतन्य तत्व आत्मा से है।
वीडियो में आगे बढ़ने से पहले हम सभी को यह ज्ञात होना चाहिए की वेदों के अनुसार उपनिषदों का किस प्रकार विभाजन किया गया है। मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार, मुख्य रूप से 108 उपनिषद माने गए हैं, जो चारों वेदों में इस प्रकार विभाजित हैं: ऋग्वेद के अंतर्गत 10 उपनिषद, शुक्ल यजुर्वेद के अंतर्गत 19, कृष्ण यजुर्वेद में 32, सामवेद में 16, और अथर्ववेद के अंतर्गत 31 उपनिषद आते हैं।
प्रथम महावाक्य है प्रज्ञानं ब्रह्म यह वाक्य ऐतरेय उपनिषद से लिया गया है। 'प्रज्ञानं ब्रह्म' का अर्थ है, "चेतना ही ब्रह्म है।" यह हमें सिखाता है कि हमारे भीतर जो देखने, सुनने और अनुभव करने वाली शुद्ध चेतना है, वही ईश्वर है, वही परम सत्य है। ज्ञान का सर्वोच्च शिखर इसी 'प्रज्ञान' को पहचानना है।
द्वितीय महावाक्य है 'अहं ब्रह्मास्मि' यह बृहदारण्यक उपनिषद का एक प्रसिद्ध महावाक्य है, जिसका अर्थ है "मैं ब्रह्म हूँ"। यह अद्वैत वेदांत का मूल है, जो आत्मा और परमात्मा की एकता को दर्शाता है। यह ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से अहंकार को मिटाकर शाश्वत स्वरूप से जोड़ता है। इस वाक्य में 'मैं' का अर्थ व्यक्ति का शरीर या नाम नहीं, बल्कि वह अनंत चेतना है जो कभी मरती नहीं। यह बोध हमें डर, मोह और तुच्छता से मुक्त कर देता है।
तीसरा और सबसे प्रसिद्ध महावाक्य है, 'तत्त्वमसि' सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद में ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह उपदेश नौ बार देते हैं। जिसमें तत्: का अर्थ वह है मतलब परमात्मा या सर्वोच्च सत्ता और त्वम्: का अर्थ तुम हैै अर्थात जीवात्मा
असि: का मतलब हो, अर्थात, "वह तुम हो।"
पुनः ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सागर की हर बूंद में सागर का ही गुण होता है, उसी प्रकार तुम भी उस अनंत ईश्वर के ही प्रतिरूप हो। तुम्हारे भीतर वही सामर्थ्य और वही दिव्यता है जो इस सृष्टि के कण-कण में है। 'तत्त्वमसि' वह बीज है, जो बोए जाने पर 'अहं ब्रह्मास्मि' का फल देता है।
चौथा महावाक्य है अयम् आत्मा ब्रह्म' यह माण्डूक्य उपनिषद से लिया गया है। इसका सरल अर्थ है: "यह आत्मा ही ब्रह्म है।"
भीतर जो चेतन तत्व है, जिसे हम 'मैं' कहते हैं, वह इस विशाल ब्रह्मांड के मूल आधार अर्थात 'ब्रह्म' से अलग नहीं है। जैसे एक घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का अनंत आकाश एक ही है, वैसे ही शरीर के भीतर विद्यमान आत्मा और संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा एक ही हैं। यह वाक्य हमारे अज्ञान को मिटाकर हमें आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की ओर ले जाता है।
जब एक साधक इस सत्य को गहराई से अनुभव करता है, तो उसके भीतर से गर्जना होती है 'अहं ब्रह्मास्मि' की।
जब हम जान लेते हैं कि हम ही वह 'ब्रह्म' हैं, तब संसार का दुख और द्वेष समाप्त हो जाता है। स्वयं को पहचानिए, क्योंकि आप अनंत हैं।
इन चारों महावाक्य का वर्णन एक श्लोक रूप में शुकरहस्योपनिषद में इस प्रकार मिलता है।
अथ महावाक्यानि चल्वारि।
ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म
ॐ अहं ब्रह्मास्मि
ॐ तत्त्वमसि
ॐ अयम् आत्मा ब्रह्म
तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति
ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति॥
"जो लोग इस अभेदवाचक (जीव और ब्रह्म में अंतर न करने वाले) 'तत्त्वमसि' महावाक्य का जप करते हैं, वे भगवान शिव के सायुज्य मोक्ष (शिव के साथ पूर्ण रूप से एक हो जाने वाली मुक्ति) को प्राप्त करते हैं।"
अद्वैत वेदांत के इन चार महावाक्यों के विषय में अपनी राय कमेंट में अवश्य बताएं।
हरि ओम्
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