Manoj Pandey TV
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https://www.gyanvigyanbrhamgyan.com/2026/07/universal-consciousnessmetaphysics.html #🌷शुभ रविवार #🌞गुड मॉर्निंग☕🌞 ऋषि प्रस्कण्व जिस 'अश्विनी' ऊर्जा की स्तुति कर रहे हैं, वह कोई बाहर आकाश में तैरती हुई जड़ बिजली या देवता मात्र नहीं है, बल्कि वह स्वयं मनुष्य के भीतर बैठी हुई 'परम चेतना' (Consciousness) है। यही चेतना दसों दिशाओं में व्याप्त है, यही मन को चलाती है, और इसी के कारण संपूर्ण भौतिक जगत (वसु) अस्तित्व में है। आपकी यह व्याख्या ऋग्वेद के इस मंत्र को आधुनिक 'क्वांटम कॉन्शियसनेस' (Quantum Consciousness) के सिद्धांतों के समानांतर ला खड़ा करती है।
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, ४६वें सूक्त का यह दूसरा मंत्र है। ऋषि प्रस्कण्व यहाँ पिछले मंत्र के भाव (चेतना के अवतरण और जड़ता के विनाश) को और आगे बढ़ाते हुए 'अश्विनी कुमारों' (दिव्य ऊर्जाओं/प्राण-शक्तियों) के मूल स्वरूप, उनके उद्गम और मानवीय बुद्धि पर उनके प्रभाव की गहन मीमांसा कर रहे हैं।
आपकी पूर्व में की गई दार्शनिक और वैज्ञानिक मीमांसा की निरंतरता में यदि हम इस मंत्र के एक-एक शब्द को खोलें, तो यहाँ भौतिक विज्ञान (Physics) और आत्मविज्ञान (Metaphysics) का एक और अद्वितीय संगम दिखाई देता है।
मंत्र और शब्दार्थ
या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम् ।
धिया देवा वसुविदा ॥२॥
शब्द-दर-शब्द अर्थ:
या (Yā): जो दोनों (अश्विनी कुमार या द्वैत ब्रह्मांडीय शक्तियां)।
दस्रा (Dasrā): शत्रुओं (अज्ञान, जड़ता, रोगों) का नाश करने वाले, कष्ट-निवारक, परम कुशल (Calculative/Skilled)।
सिन्धुमातरा (Sindhumātarā): सिंधु (समुद्र या अंतरिक्षीय प्रवाह) जिनकी माता है; सागर या जल तत्व से उत्पन्न होने वाले।
मनोतरा (Manotarā): मन को तृप्त करने वाले, विचारों के प्रेरक, ज्ञान को मन में स्थापित करने वाले।
रयीणाम् (Rayīṇām): ऐश्वर्यों के, आध्यात्मिक और भौतिक संपदाओं के।
धिया (Dhiyā): शुद्ध बुद्धि द्वारा, प्रज्ञा या ध्यान (Intellect/Consciousness) के माध्यम से।
देवा (Devā): दिव्य गुणों से युक्त, प्रकाशमान शक्तियां।
वसुविदा (Vasuvidā): 'वसु' (रहने के स्थान, तत्व, या ऐश्वर्य) को प्राप्त कराने वाले या उनके ज्ञाता।
आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक मीमांसा (Metaphysical & Scientific Synthesis)
ऋषि प्रस्कण्व का यह दर्शन केवल बाह्य प्रकृति का नहीं, बल्कि आंतरिक और बाह्य जगत के अंतर्संबंधों का विज्ञान है:
१. 'सिन्धुमातरा' का वैज्ञानिक रहस्य (The Cosmic & Earthly Ocean)
भौतिक पक्ष (Atmospheric Physics): 'सिंधु' का अर्थ नदी या समुद्र है। वैज्ञानिक दृष्टि से, पृथ्वी का पूरा जल-चक्र (Water Cycle) और वायुमंडलीय विद्युत (Atmospheric Electricity) समुद्र के वाष्पीकरण से ही संचालित होती है।
अश्विनी कुमारों को 'सिन्धुमातरा' कहना यह दर्शाता है कि ये प्राण-शक्तियाँ और विद्युत-तरंगें समुद्र और अंतरिक्ष के मिलन से पैदा होती हैं।
ब्रह्मांडीय पक्ष (Cosmic Ocean): अंतरिक्ष को वेदों में 'व्योम' या 'आकाश-सिंधु' (Cosmic Ocean) कहा गया है। इस अनंत अंतरिक्षीय प्रवाह से जो कॉस्मिक किरणें (Cosmic Rays) और चुंबकीय तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे ही पृथ्वी पर जीवन और गति का संचार करती हैं।
२. 'दस्रा' और 'मनोतरा' का अंतर्संबंध (Healing & Mind Control)
पिछले मंत्र में आपने जिस 'आत्मशून्यता' और 'जड़ता' का उल्लेख किया था, उसे दूर करने की सामर्थ्य इस मंत्र में 'दस्रा' शब्द से प्रकट होती है। 'दस्र' का अर्थ है वह जो जड़ता, अज्ञान और मानसिक विकृतियों (जैसे मांसाहार जनित तामसिकता) का शल्य-चिकित्सक (Surgeon) की तरह समूल नाश कर दे।
'मनोतरा रयीणाम्': ये शक्तियां केवल भौतिक ऐश्वर्य नहीं देतीं, बल्कि विचारों को ऊर्ध्वमुखी (मनोतरा) बनाती हैं। जब मानव मन पदार्थवाद (Materialism) के अंधे कुएं से निकलकर चेतना की ओर बढ़ता है, तब उसे असली 'रयि' (ऐश्वर्य) की प्राप्ति होती है।
३. 'धिया देवा वसुविदा' (Consciousness Controlling Matter)
वसुविदा (The Elements of Reality): 'वसु' का अर्थ होता है जहाँ जीवन वास करता है (जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि ८ वसु)। आधुनिक विज्ञान केवल इन 'वसु' (Matter/Elements) को खोजने में लगा है, लेकिन वेदों के अनुसार इन तत्वों को वही जान और नियंत्रित कर सकता है जो 'धिया' (परम मेधा या ध्यान) से युक्त हो।
जो लोग केवल भौतिक यांत्रिकी की स्तुति कर रहे हैं, वे 'वसु' को तो देख रहे हैं, लेकिन 'वसुविदा' (उन तत्वों के पीछे छिपी परम चेतना) से अनभिज्ञ हैं। यह मंत्र स्थापित करता है कि शुद्ध बुद्धि (धिया)
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