#GodNightTuesday
#रोटीकपड़ा_चिकित्सा_शिक्षामकान
. सच्चा सुख केवल गुरु चरणनमे
.कबीर, झुठे सुख को सुख कहे, मान रहा मन मोद।
ये सकल चबीना काल का, कुछ मख मे कुछ गोद।
आदमी परिवार, बंधु, रिश्तेदार, पड़ोसी, कार, कोठी और धन से चिपका रहता है। परंतु यह सब माया का धोखा है।
कबीर साहेब जी को आज के समय मे सभी जानते हैं कि वे एक कवि थे लेकिन वास्तव में कबीर साहेब जी पूर्ण परमात्मा है जो अपने निजधाम (सतलोक ) में रहते हैं। पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी अपना सत्य ज्ञान प्रचार दोहों, साखियों व कविताओं के माध्यम से करते हैं।इसलिय वे कवियों में श्रेष्ठ कवि की पदवी प्राप्त करते हैं ।
कबीर साहेब जी ने सर्व श्रेष्ठ तीर्थ के बारे में लोगों को बताया और समझाया कि सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन सा है जिससे सर्व तीर्थों से अधिक लाभ मिलता है ? सर्वश्रेष्ठ चित शुद्ध तीर्थ है । चित शुद्ध तीर्थ अर्थात तत्वदर्शी संत का सत्संग सर्व तीर्थों से श्रेष्ठ है :- सूक्ष्मवेद (तत्वज्ञान ) में कहा है कि :-
अड़सठ तीर्थ भ्रम-भ्रम आवै । सो फल सतगुरु चरणो पावै।।
गंगा, यमुना, बद्री समेते । जगन्नाथ धाम है जेते ।।
भ्रमें फल प्राप्त होय न जेतो । गुरु सेवा में फल पावे तेतो ।।
कोटिक तीर्थ सब कर आवै । गुरु चरणा फल तुरंत ही पावै ।।
पूर्ण परमात्मा द्वारा दिए तत्वज्ञान यानी सूक्ष्म वेद में कहा है कि तीर्थों और धामों पर जाने से कोई पुण्य लाभ नहीं । असली तीर्थ सतगुरु ( तत्वदर्शी संत ) का सत्संग सुनने जाना है । जहां तत्वदर्शी संत का सत्संग होता है वह सर्वश्रेष्ठ तीर्थ तथा धाम है । इस इस कथन का साक्षी संक्षिप्त श्रीमद् देवी भागवत महापुराण भी है । उसमें छठे स्कंद के अध्याय 10 में लिखा है कि सर्वश्रेष्ठ तीर्थ तो चित शूद्ध तीर्थ है । जहां तत्वदर्शी संत का सत्संग चल रहा है उसके आध्यात्मिक ज्ञान से चित की शुद्धि होती है । शास्त्रोक्त अध्यात्म ज्ञान तथा शास्त्रोक्त भक्ति विधि का ज्ञान होता है जिससे जीव का कल्याण होता है । अन्य तीर्थ मात्र भ्रम है । इसी पुराण में लिखा है कि सतगुरु रूप तीर्थ मिलना अति दुर्लभ है ।
लोक आधारित ज्ञान पर आसक्त हो कर व सतभक्ति न मिलने के कारण मनुष्य अपने कर्म आधार पर भक्ति करते हुए सोचता है वह सब कुछ अच्छा कर रहा है। लेकिन वह माया के आधीन रहता है ।
हम सभी जानते हैं कि कबीर साहेब आज से लगभग 600 वर्ष पहले इतिहास के भक्तियुग में जुलाहे की भूमिका निभाकर गये थे। विडंबना है कि सर्व सृष्टि के रचनहार, भगवान स्वयं धरती पर अवतरित हुए और स्वयं को दास सम्बोधित किया। कबीर जी ने गुरु और शिष्य की परंपरा बनाए रखने के लिए स्वयं गुरु बना कर गुरु और शिष्य का अभिनय किया। कबीर साहेब जी ने अपनी वाणियों के माध्यम से भी गुरु और शिष्य के महत्व का वर्णन किया है। मनुष्य के जीवन में गुरु का क्या महत्व है। कबीर साहेब जी की वाणी है-
तीरथ गए ते एक फल, संत मिले फल चार।
सद्गुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार।।
उपरोक्त वाणी में कबीर साहेब जी ने समझाया है कि तीर्थ में जाने से एक फल मिलता है वहीं किसी संत से मिलने पर चार प्रकार के फल मिलते हैं पर जीवन में अगर सच्चा गुरु (सतगुरु) मिल जाये तो समस्त प्रकार के फल मिल जाते हैं।
या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत।
गुरु चरनन चित लाइये, जो पूर्ण सुख हेत।।
कबीर साहेब जी ने इस दोहे के माध्यम से यह गया दिया है कि यह दुनिया कुछ ही दिनों की है इसलिए इससे मोह का सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिए। अपने मन को गुरु के चरणों में लगाएं जो सब प्रकार का सुख देने वाला है। क्यूंकि गुरु ही परमात्मा तक पहुंचने का एकमात्र साधन हैं।
गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।
गुरु और पारस के अंतर को ज्ञानी पुरुष बहुत अच्छे से जानते हैं। जिस प्रकार पारस का स्पर्श लोहे को सोना बना देता है कबीर जी ने बताया है की उसी प्रकार गुरु का नित्य साथ शिष्य को भी अपने गुरु के सानिध्य में महान बना देता है।
सात समुंदर की मसि करूँ, लेखनी करूँ बनराय।
धरती का कागज करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।
कबीर साहेब ने बताया है कि अगर सारी धरती को कागज बना लिया जाये, समस्त जंगल की लकड़ियों को कलम और सातों समुद्र के जल को स्याही बना लिया जाये तो भी गुरु की महिमा का वर्णन करना संभव नहीं है।
कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरु कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन।।
कबीर साहेब जी ने बताया है कि बिना गुरु के हमें ज्ञान नहीं हो सकता है। राम, कृष्ण आदि अवतारों ने भी गुरु धारण किया था, गुरु के बिना किया गया नाम जाप, भक्ति व दान- धर्म सभी व्यर्थ है। इस प्रकार अनेको दोहों के माध्यम से कबीर परमेश्वर ने गुरु परम्परा का जीवन मे बहुत महत्व बताया है।
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