संत हृदय नवनीत समाना। कहा कविन्ह परि कहै न जाना ॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता । सुपुनीता ॥ पर दुख द्रवहिं सं🌾
🥀अर्थात🥀
संतों का हृदय मक्खन के समान होता है ऐसा कवियों ने कहा है, परन्तु उन्होंने (असली बात) कहना नहीं जाना, क्योंकि मक्खन तो अपने को ताप मिलने से पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघल जाते हैं।🌿
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