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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . अज्ञानी गुरु को तुरंत त्याग दो झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार। द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार।। कबीर साहेब जी कहते हैं कि अज्ञानी गुरु के मत तथा स्थान को त्यागने में पल-भर की भी देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसके ज्ञान से सार-शब्द का मार्ग नहीं मिल सकता और इस संसार में बारंबार भटकते रहना पड़ेगा! कविर्देव ने अपनी वाणी में कहा है कि एक जीव को काल साधना से हटा कर पूर्ण गुरू के पास लाकर सत उपदेश दिलाने का पुण्य इतना होता है कि जितना करोड़ गाय-बकरें आदि प्राणियों को कसाई से छुटवाने का होता है। क्योंकि यह अबोध मानव शरीर धारी प्राणी गलत गुरुओं द्वारा बताई गई शास्त्र विरूद्ध साधना से काल के जाल में फंसा रह कर न जाने कितने दुःखदाई चौरासी लाख योनियों के कष्ट को झेलता रहता है। जब यह जीवात्मा कविर्देव (कबीर साहेब) की शरण में पूरे गुरू के माध्यम से आ जाती है, नाम से जुड़ जाती है तो फिर इसका जन्म तथा मृत्यु का कष्ट सदा के लिए समाप्त हो जाता है और सतलोक में वास्तविक परम शांति को प्राप्त करता है। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी सत्संग मे बताते है कि सामवेद के श्लोक नं. 822 में बताया गया है कि जीव की मुक्ति तीन नामों से होगी। प्रथम ऊँ, दूसरा सतनाम (तत्) और तीसरा सारनाम (सत्)। यही गीता जी भी प्रमाण देती है कि - ऊँ-तत्-सत् और श्री गुरु ग्रन्थ साहेब भी इसी सतनाम जपने का इशारा कर रहा है। सतनाम-सतनाम कोई जपने का नाम नहीं है। यह तो उस नाम की तरफ इशारा कर रहा है जो एक सच्चा नाम है। इसी तरह यह सारनाम भी। अकेला ऊँ मन्त्र किसी काम का नहीं है। ये तीनों नाम व नाम देने की आज्ञा संत रामपाल जी महाराज जी को गुरुदेव जी स्वामी रामदेवानन्द जी महाराज जी द्वारा बकसीस है जो कबीर साहेब से पीढी दर पीढी चलती आ रही है। पहले आप सतसंग सुनो, सेवा करो जिससे आपका भक्ति रूपी खेत संवर जाएगा। कबीर, मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटैं हरि नाम। जैसे कुआँ जल बिना, खुदवाया किस काम।। कबीर, एक हरि के नाम बिना, ये राजा ऋषभ हो। माटी ढोवै कुम्हार की, घास न डालेको।। इसके पश्चात् अपने संवरे हुए खेत में बीज बोना होगा। शास्त्रों (कबीर साहेब की वाणी, वेद, गीता, पुराण, कुराण, धर्मदास साहेब आदि संतों की वाणी) के अध्ययन से मुक्ति नहीं होगी। इन सभी शास्त्रों का एक ही सार (निचोड़) है कि पूर्ण मुक्ति के लिए पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के प्रतिनिधि संत(जिनको उनके गुरु द्वारा नाम देने की आज्ञा भी हो) से नाम उपदेश ले कर आत्म कल्याण करवाना चाहिए। यदि नाम नहीं लिया तो - नाम बिना सूना नगर, पड़या सकल में शोर। लूट न लूटी बंदगी, हो गया हंसा भोर।। अदली आरती अदल अजूनी, नाम बिना है काया सूनी। झूठी काया खाल लुहारा, इंगला पिंगला सुषमन द्वारा।। कृतघ्नी भूले नर लोई, जा घट निश्चय नाम न होई। सो नर कीट पतंग भुजंगा, चैरासी में धर है अंगा। यदि बीज नहीं बीजा तो आत्मा रूपी खेत की गुड़ाई अर्थात् तैयारी करना व्यर्थ हुआ। कहने का अभिप्राय यह है कि इनसे आपको ज्ञान होगा जो कि आवश्यक है। परंतु पूर्ण गुरू द्वारा नाम उपदेश लेना अर्थात् बीज बीजना भी अति आवश्यक है। नाम भी वही जपना होगा जो कि गुरु नानक साहेब जी ने जपा, गरीबदास साहेब ने जपा, धर्मदास साहेब आदि संतों ने जपा। इसके अतिरिक्त अन्य नामों से जीव की मुक्ति नहीं होगी। इसलिए आप सभी ने नाम उपदेश लेकर अपना भक्ति रूपी धन जोड़ना प्रारम्भ करना चाहिए और अन्य सभी को भी बताना चाहिए। जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी। चूंकि न जाने कब और किस समय इस शरीर का पूरा होने का समय आ जाए। गुरु नानक देव जी भी कहते हैं कि- ना जाने ये काल की कर डारै, किस विधि ढल जा पासा वे। जिन्हादे सिर ते मौत खुड़गदी, उन्हानूं केड़ा हांसा वे।। कबीर साहेब कहते हैं कि - कबीर, स्वांस-स्वांस में नाम जपो, व्यर्था स्वांस मत खोए। न जाने इस स्वांस का, आवन हो के ना होए।। सतगुरू सोई जो सारनाम दृढ़ावै, और गुरू कोई काम न आवै। ‘‘सार नाम बिन पुरुष (भगवान) द्रोही‘‘ अर्थात् जो गुरू सारनाम व सारशब्द नहीं देता है या उसको अपने गुरू द्वारा नाम देने का अधिकार (आज्ञा) नहीं है अर्थात् शास्त्रों के अध्ययन से यदि कोई मनमुखी गुरु ये नाम भी दे देता हो तो भी वह गुरु और उनके शिष्यों को नरक में डाला जाएगा। वह गुरु भगवान का दुश्मन है, विद्रोही है। उसे भगवान के दरबार में उल्टा लटकाया जाएगा। अब भक्त समाज में नकली गुरुओं द्वारा एक गलत धारणा फैला रखी है कि एक बार गुरु धारण करने के पश्चात दूसरा गुरु नहीं बदलना चाहिए। जरा विचार करके देखो कि गुरु हमारे जन्म-मृत्यु रूपी रोग को काटने वाला वैद्य होता है। यदि एक वैद्य से हमारा रोग नहीं कटता है तो हम दूसरे अच्छे वैद्य(डाक्टर) के पास जाएंगे जिससे हमारा जानलेवा रोग ठीक हो सके। जैसे धर्मदास साहेब के पहले गुरु श्री रूपदास जी थे। लेकिन जब धर्मदास जी को पता लगा कि यह गुरु पूर्ण मुक्ति दाता नहीं है तो तुरंत त्याग कर पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर सतपुरुष कबीर साहेब को अपना गुरु बनाया और पूर्ण मोक्ष सत्य लोक में प्राप्त किया। ठीक इसी प्रकार अधूरे गुरु को तुरंत त्याग देना चाहिए। गरीब, बिन उपदेश अचंभ है, क्यों जीवत हैं प्राण। बिन भक्ति कहाँ ठौर है, नर नाहिं पाषाण।।1।। गरीब, एक हरि के नाम बिना, नारि कुतिया हो। गली-2 भौंकत फिरै, टूक ना डालै को।।2।। गरीब, बीबी पड़दे रहैं थी, डयोढी लगती बार। गात उघाड़े फिरती हैं, बन कुतिया बाजार।।3।। गरीब, नकबेसर नक से बनी, पहरत हार हमेल। सुन्दरी से सुनही बनी, सुनि साहिब के खेल। कबीर, हरि के नाम बिना, राजा ऋषभ होए। माटी लदै कुम्हार कै, घास ना डाले कोए।।5।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हौ भी गुरु कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन।।6।। कबीर, गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हरि की सेव। कहै कबीर स्वर्ग से, फेर दिया सुखदेव।।7।। कबीर, राजा जनक से नाम ले, किन्हीं हरी की सेव। कहै कबीर बैकुण्ठ में, उल्ट मिले सुखदेव।।8।। कबीर, सतगुरु के उपदेश का, लाया एक विचार। जै सतगुरु मिलते नहीं, जाता नरक द्वार।।9।। कबीर, नरक द्वार में दूत सब, करते खैंचा तान। उनतें कबहु ना छुटता, फिर फिरता चारों खान।। कबीर, चार खानी में भ्रमता, कबहु ना लगता पार। सो फेरा सब मिट गया, सतगुरु के उपकार।।11।। कबीर, सात समुन्द्र मसि करूं, लेखनी करूं बनराय। धरती का कागद करूं, गुरु गुण लिखा न जाए।12। कबीर, गुरु बड़े गोविन्द से, मन में देख विचार। हरि सुमरे सो रह गए, गुरु भजे हुए पार।।13।। कबीर, गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागुं पाय। बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दिया मिलाय।। कबीर, हरि के रूठतां, गुरु की शरण में जाय। कबीर गुरु जै रूठजां, हरि नहीं होत सहाय।। Sa True Story YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
sant ram pal ji maharaj - झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार। द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार।| कबीर साहेब जी कहते हैं कि अज्ञानी गुरु के मत तथा स्थान को त्यागने में पल-्भर की भी देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके ज्ञान से सार-शब्द का मार्ग नहीं मिल सकता और इस संसार में बारंबार भटकते रहना पड़ेगा SatlokAshramMundka SADelhiMundka SatlokAshramMundkaofcial झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार। द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार।| कबीर साहेब जी कहते हैं कि अज्ञानी गुरु के मत तथा स्थान को त्यागने में पल-्भर की भी देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके ज्ञान से सार-शब्द का मार्ग नहीं मिल सकता और इस संसार में बारंबार भटकते रहना पड़ेगा SatlokAshramMundka SADelhiMundka SatlokAshramMundkaofcial - ShareChat