कंधे पर अटकी पोटली, मन में घर की आस, चल पड़ा है घर से दूर लेकर इक विश्वास। धूप हो या छांव गहरी, पाँव रुकते नहीं हैं, ये बिहारी मजदूर हैं, जो कभी झुकते नहीं हैं। ​पसीना बहता माथे से, बंजर को सींच आते हैं, खुद भूखे रहकर अपनों को, दो रोटी खींच लाते हैं। मुंबई की लोकल हो या दिल्ली की ठंड रात, हर महानगर की ईंटों पर लिखी है इनकी बात। ​पक्के महलों को बनाते, खुद झोपड़ी में रहते हैं, दर्द सीने में दबाकर, बस मुस्कुराते रहते हैं। गाँव की वो सोंधी माटी, बच्चों की वो किलकारी, यादों के सहारे कटती, हर एक रात अंधियारी। ​चक्की की दो पाटों के बीच, पिसता इनका जीवन है, फिर भी इन हाथों में दुनिया, रचने का अर्पण है। अभिमान है इस माटी पर, जो श्रम का दीप जलाती है, हर कठिनाई को चीरकर, मंजिल अपनी पाती है। ##स्टडीमोटिवेशन #प्रेरणा #सफलताकीओर #लक्ष्य #पढ़ाई #मेहनत #कभीहारनहीं #StudentLife #DreamBig
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