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#✍️ साहित्य एवं शायरी
✍️ साहित्य एवं शायरी - लबा लब भरा है यह समंदर फिर क्यों बूंद को तरसता है जवानी के मोड़ पे आकर भी मुझमें कोई बंचपन हंसता है कोई ना आ सका दिल तक दिल का ऐसा सीधा रस्ता है द्दैुख़ञों बुदषालं है अबसमास सारहै बादल कब बरसता है अब यहां पे मन नहीं लगता यहां फजा   ज्यादा खस्ता है शहर के अन्दर बस कर भी मेरे अंदर एकगांव बसता है मैं जाऊंगा पश्चिम एकरोज वहां अच्छी व्यवस्था है सुनो रहना भी क्यों यहां 'बेखबर यहां किसीसे क्या वाबस्ता है लबा लब भरा है यह समंदर फिर क्यों बूंद को तरसता है जवानी के मोड़ पे आकर भी मुझमें कोई बंचपन हंसता है कोई ना आ सका दिल तक दिल का ऐसा सीधा रस्ता है द्दैुख़ञों बुदषालं है अबसमास सारहै बादल कब बरसता है अब यहां पे मन नहीं लगता यहां फजा   ज्यादा खस्ता है शहर के अन्दर बस कर भी मेरे अंदर एकगांव बसता है मैं जाऊंगा पश्चिम एकरोज वहां अच्छी व्यवस्था है सुनो रहना भी क्यों यहां 'बेखबर यहां किसीसे क्या वाबस्ता है - ShareChat