🍷 *लॉकडाउन की मधुशाला* 🍷
*कोई मांग रहा था देशी बोतल*
*और कोई मांग रहा था फॉरेन वाला ¡*
*देश के वीर अनेकों टूट पड़े थे,*
*जब खूल चुकी थी मधुशाला !*
*जब शासन का आदेश हुआ था,*
*गदगद था ठेके वाला !*
*पहला ग्राहक देव रूप था,*
*अर्पित किया उसे माला !*
*वाईन शोप पर भक्तों की लंबी कतारें,*
*वहा भेद मिटा सब गोरा काले का*
*वहा हिन्दू मुस्लिम साथ खड़े थे,*
*मेल कराती मधुशाला !*
*चालीस दिन की प्यास तेज थी,*
*देशी पर भी था ताला*
*पहली बूंद के प्याले भरने से,*
*छलक उठा मय का प्याला !*
*गटक गया वो सारी बोतल,*
*तृप्त हुई उसकी उर की ज्वाला !*
*राग द्वेष सब भूल चुका था,*
*जो बाहर था अंदर वाला !*
*हंस के उसने गर्व से बोला,*
*ओ देख ले ऐ ऊपर वाला !*
*मंदिर मस्जिद बंद हैं तेरे,*
*अब खुली हुई है मधुशाला !*
*पैर बिचारे उनके झूम रहे थे,*
*आगे था सीवर नाला !*
*जलधारा में लीन हो गया,*
*जैसे ही एक पेग को अंदर डाला !*
*दौड़े भागे लोग सब उसे उठाने,*
*उनका नाक - मुंह सब था काला !*
*देखो अपने दीवाने की हालत,*
*यह देख रही थी मधुशाला !!*
🙏 🙏 #कविता की कविता


