नई दिल्ली: शुक्रवार की शाम भारत के संसदीय इतिहास में एक बड़े उलटफेर की गवाह बनी। मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया 131वां संविधान संशोधन बिल 2026 लोकसभा में पास नहीं हो पाया। पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल सदन में गिरा है।
दो दिनों तक चली लंबी बहस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपीलों के बावजूद सरकार जरूरी आंकड़ों का जुगाड़ नहीं कर पाई. सदन में वोटिंग के दौरान बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 सदस्यों ने बटन दबाया। इस नतीजे से एक सवाल उठा है कि क्या महिला आरक्षण जैसा संवदेनशील मुद्दा भी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया बना दिया गया?
लोकसभा में क्यों गिरा संविधान संशोधन विधेयक? 5 प्रमुख कारण
दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा न छू पाना: संविधान संशोधन के लिए सदन में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत (2/3) अनिवार्य है। शुक्रवार को वोटिंग के समय 528 सदस्य मौजूद थे, जिसके हिसाब से बिल पास कराने के लिए कम से कम 352 वोटों की जरूरत थी. सरकार के पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़े, जिससे बिल तकनीकी रूप से फेल हो गया।
परिसीमन और जनगणना की शर्त पर विवाद: विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध बिल को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने पर था। कांग्रेस और अन्य दलों का आरोप है कि सरकार आरक्षण को तुरंत लागू करने के बजाय इसे भविष्य की अनिश्चितता में डाल रही है। विपक्ष की मांग थी कि 2026 की परिसीमन प्रक्रिया का इंतजार किए बिना मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण लागू किया जाए।
दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने का डर: दक्षिण के राज्यों को अंदेशा है कि नए परिसीमन और सीटों की संख्या 850 तक बढ़ने से उनकी राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी। जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले इन राज्यों को लगता है कि उत्तर भारत की सीटें बढ़ने से केंद्र में उनका दबदबा घटेगा. इसी क्षेत्रीय असंतुलन के डर ने विपक्षी दलों को बिल के खिलाफ एकजुट कर दिया।
विपक्ष का मजबूत और एकजुट फ्लोर कोऑर्डिनेशन: पिछले 12 सालों में यह पहली बार देखा गया कि विपक्ष ने इतनी सटीक रणनीति के साथ सरकार को घेरा। मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे दिग्गज नेताओं के बीच हुए बेहतर तालमेल ने सरकार के रणनीतिकारों को चौंका दिया। विपक्ष ने एक सुर में परिसीमन को 'चुनावी नक्शा बदलने की साजिश' बताकर वोटिंग में सरकार को पछाड़ दिया।
सरकार की नंबर गेम पर अति-आत्मविश्वास वाली रणनीति: सरकार को उम्मीद थी कि वह कुछ छोटे दलों या स्वतंत्र सांसदों को अपने पक्ष में कर लेगी, लेकिन अंतिम समय में समाजवादी पार्टी और टीएमसी जैसे दलों के कड़े रुख ने गणित बिगाड़ दिया। बीजेपी के रणनीतिकार जरूरी 360 वोटों का जुगाड़ करने में नाकाम रहे और गृह मंत्री की अपीलों का भी विपक्षी एकता पर कोई खास असर नहीं हुआ।
क्या थी वह कानूनी बाधा जिसने बिल को रोक दिया?
महिला आरक्षण बिल एक साधारण विधेयक नहीं बल्कि एक संविधान संशोधन बिल था। भारत के संविधान के मुताबिक किसी भी संवैधानिक बदलाव के लिए दो तरह के बहुमत की जरूरत होती है। पहला, सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और दूसरा, उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई हिस्सा। 540 सदस्यों वाली लोकसभा में बिल पास कराने के लिए सरकार को कम से कम 360 वोटों की दरकार थी। हालांकि सरकार को केवल 298 वोट ही मिल पाए, जो जरूरी आंकड़े से 62 कम थे। यही वजह रही कि बिल को सदन ने खारिज कर दिया। इस संवैधानिक प्रक्रिया ने यह साफ कर दिया कि केवल बहुमत होना ही काफी नहीं है, बल्कि बड़े बदलावों के लिए विपक्ष का साथ होना भी उतना ही जरूरी है।
विपक्ष ने क्यों किया इस बिल का जोरदार विरोध?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने इस बिल की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में देश का चुनावी नक्शा बदलना चाहती है। बिल में आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) और जनगणना से जोड़ा गया था।
विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन के जरिए उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। राहुल गांधी ने इसे 'महिलाओं के पीछे छिपकर चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश' करार दिया।
विपक्ष की मांग थी कि आरक्षण को तुरंत लागू किया जाए और इसे परिसीमन से अलग रखा जाए। विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार के इस कदम को रोकने का फैसला किया था, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम भी दिया।
परिसीमन और सीटों की संख्या पर क्या था सरकार का प्लान?
सरकार इस बिल के जरिए लोकसभा की सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करना चाहती थी। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के मुताबिक यह कदम 2029 के चुनावों से पहले महिला आरक्षण को जमीन पर उतारने के लिए जरूरी था।
सरकार का तर्क था कि बिना सीटों की संख्या बढ़ाए महिलाओं को 33 परसेंट कोटा देना व्यावहारिक रूप से मुश्किल होगा. इसके लिए तीन अलग-अलग बिल लाए गए थे जो एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
चूंकि मुख्य संविधान संशोधन बिल ही गिर गया, इसलिए सरकार ने बाकी दो बिलों को भी वापस ले लिया। सरकार का कहना था कि वह सीटों का विस्तार करके सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देना चाहती थी, लेकिन विपक्ष ने इसे अपनी चुनावी रणनीति के खिलाफ माना।
अमित शाह और पीएम मोदी ने विपक्ष को कैसे घेरा?
वोटिंग से पहले गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि विपक्ष बहाने बनाकर महिला आरक्षण को रोकना चाहता है. अमित शाह ने चेतावनी दी कि आने वाले चुनाव में देश की महिलाएं इस अपमान का बदला लेंगी।
वहीं पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर अपील की थी कि सभी दल संवेदनशीलता के साथ वोट करें। उन्होंने कहा कि करीब चार दशकों से यह मुद्दा लटका हुआ है और अब देश की आधी आबादी को उनका हक देने का समय आ गया है।
बिल गिरने के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे 'लोकतंत्र के लिए काला दिन' करार दिया है। सरकार ने अपनी ओर से हर संभव कोशिश की थी कि विपक्ष के भ्रम को दूर किया जा सके, लेकिन बहस के अंत में संख्या बल की कमी ने खेल बिगाड़ दिया।
कैसे फ्लोर कोऑर्डिनेशन ने पलटी पूरी बाजी?
इस बार विपक्ष की एकजुटता काफी मजबूत दिखाई दी। खबरों के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी समेत कई नेताओं से फोन पर बात की थी। बेहतर फ्लोर कोऑर्डिनेशन के जरिए विपक्ष ने सरकार को घेरे रखा। समाजवादी पार्टी और टीएमसी के नेताओं ने एकजुट होकर वोटिंग में हिस्सा लिया। प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस जीत पर खुशी जताते हुए कहा कि अगर ये बिल पास हो जाते तो देश में लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता। उन्होंने इसे राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में लिया गया फैसला बताया। विपक्ष का यह समन्वय भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत है कि वे बड़े मुद्दों पर एक साथ आ सकते हैं।
अब आगे क्या होगा महिला आरक्षण का भविष्य?
बिल के गिरने से 2029 के लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू होने की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है. सरकार ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल इस दिशा में आगे नहीं बढ़ेगी। अब यह मुद्दा पूरी तरह से राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका है। बीजेपी इसे जनता के बीच ले जाकर विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने की कोशिश करेगी. वहीं विपक्ष इसे दक्षिण भारत के हितों की रक्षा और मोदी सरकार की तानाशाही के खिलाफ बड़ी जीत के तौर पर पेश करेगा। आने वाले दिनों में महिला आरक्षण का यह मुद्दा सड़कों पर आंदोलनों की शक्ल ले सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब यह लड़ाई सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि वोट बैंक की राजनीति का बड़ा हिस्सा बनेगी।
राज्यों की विधानसभाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा?
प्रस्तावित कानून के तहत सिर्फ लोकसभा ही नहीं बल्कि राज्यों की विधानसभाओं में भी 33 परसेंट सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होनी थी। बिल के गिरने का मतलब है कि अब राज्यों में भी पुरानी व्यवस्था ही बनी रहेगी। विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सरकार की 'बदनीयती' के खिलाफ हैं। अखिलेश यादव ने इस हार पर तंज कसते हुए कहा कि सरकार की फरेबी गाड़ी थम गई है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार भविष्य में विपक्ष की मांगों को मानते हुए बिना परिसीमन की शर्त के नया बिल लाती है या नहीं। राज्यों की राजनीति में भी अब महिलाओं की भागीदारी को लेकर नए सवाल खड़े होंगे।
क्या वाकई दक्षिण भारत के साथ अन्याय हो रहा था?
दक्षिण भारतीय राज्यों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है। अगर 2021 की जनगणना (जो अब तक नहीं हुई है) के आधार पर परिसीमन होता है, तो उनकी सीटें कम हो सकती हैं. विपक्ष का तर्क है कि महिलाओं को आरक्षण देने के लिए सीटों की संख्या 850 करने की कोई जरूरत नहीं है। इसे मौजूदा 543 सीटों पर भी लागू किया जा सकता है। इसी तकनीकी पेच और भरोसे की कमी ने इतने महत्वपूर्ण बिल को अधर में लटका दिया। दक्षिण के राज्यों को लगा कि यह उनकी राजनीतिक ताकत को कम करने का एक तरीका है, जिसे उन्होंने सिरे से नकार दिया।
क्या यह सरकार की रणनीतिक विफलता है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार अपनी संख्या बल को लेकर जरूरत से ज्यादा आश्वस्त थी। सूत्रों के मुताबिक आखिरी वक्त पर कुछ विपक्षी दलों को मनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन बात नहीं बनी। बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना है कि बिल का गिरना उनके लिए एक राजनीतिक हथियार बन सकता है। वे अब जनता के बीच जाकर खुद को महिला अधिकारों का 'शहीद' साबित करेंगे। वहीं विपक्ष के लिए यह एकजुटता दिखाने का एक बड़ा मौका साबित हुआ है, जिससे 2029 की लड़ाई और भी दिलचस्प हो गई है। सरकार को इस बात का अंदाजा नहीं था कि विपक्ष इतनी मजबूती से अपनी बात पर अड़ा रहेगा।
देश की जनता और महिलाओं की इस पर क्या राय है?
इस बिल के गिरने के बाद देश भर की महिलाओं में मिली-जुली प्रतिक्रिया है. कुछ महिलाएं इसे सरकार की विफलता मान रही हैं, तो कुछ को लगता है कि विपक्ष ने उनके अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया है. सोशल मीडिया पर 'महिला आरक्षण' ट्रेंड कर रहा है और लोग अपनी-अपनी विचारधारा के हिसाब से तर्क दे रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में जहां महिला सशक्तिकरण एक बड़ा मुद्दा है, वहां इस बिल के गिरने से काफी निराशा देखी जा रही है। लोगों का मानना है कि राजनीति के चक्कर में एक बार फिर महिलाओं का हक पीछे छूट गया है। अब यह देखना होगा कि आने वाले विधानसभा चुनावों में जनता किस पक्ष के तर्कों पर भरोसा करती है।
चुनावी नक्शा बदलने का आरोप कितना सच है?[
विपक्ष का सबसे बड़ा हमला परिसीमन को लेकर था. उनका कहना है कि अगर सीटों की संख्या बढ़ती है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें काफी ज्यादा हो जाएंगी। इससे केंद्र की राजनीति में इन राज्यों का दबदबा और बढ़ जाएगा. दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि उनकी आवाज दिल्ली में कमजोर हो जाएगी। सरकार का कहना था कि यह डर निराधार है और सीटों का बंटवारा वैज्ञानिक तरीके से होगा। लेकिन विपक्ष ने सरकार के इन दावों पर यकीन नहीं किया. इस अविश्वास की वजह से एक ऐसी स्थिति बनी जिसने पूरे बिल को ही धराशायी कर दिया।
क्या सरकार के पास कोई 'प्लान बी' था?
आमतौर पर मोदी सरकार अपनी रणनीति के लिए जानी जाती है, लेकिन इस बार ऐसा लगा कि उनके पास बिल गिरने की स्थिति में कोई वैकल्पिक योजना नहीं थी। वोटिंग के तुरंत बाद किरेन रिजिजू का यह बयान कि 'सरकार अब बाकी दो बिलों को आगे नहीं बढ़ाएगी', यह दिखाता है कि सरकार पूरी तरह से इस संशोधन पर ही टिकी थी। विपक्ष ने इस कमजोरी को भांप लिया और अंत तक अपनी एकजुटता बनाए रखी। समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे दलों ने पहले भी इस बिल के पुराने स्वरूप का विरोध किया था, लेकिन इस बार विरोध का कारण परिसीमन और जनगणना बन गया।
राजनीतिक दलों के बीच अब शुरू होगा जुबानी जंग का दौर
शिवराज सिंह चौहान ने इसे 'काला दिन' बताया है और विपक्ष को घेरते हुए कहा है कि उन्होंने बहनों के सपनों को रौंद दिया है। वहीं विपक्ष का खेमा इसे संविधान बचाने की लड़ाई बता रहा है।
आने वाले समय में टीवी डिबेट्स और रैलियों में यही मुद्दा छाया रहेगा। बीजेपी इसे 'नारी विरोधी विपक्ष' के रूप में पेश करेगी, जबकि विपक्ष इसे 'संविधान और लोकतंत्र की रक्षा' के रूप में देखेगा।
यह देखना दिलचस्प होगा कि यह राजनीतिक खींचतान देश के भविष्य को किस दिशा में ले जाती है। क्या सच में किसी दल को महिलाओं की चिंता है या यह सब केवल सत्ता का समीकरण साधने का एक तरीका है, यह सवाल अब हर नागरिक के मन में है।
क्या भविष्य में किसी समझौते की गुंजाइश है?
इस हार के बाद सवाल यह भी उठता है कि क्या सरकार और विपक्ष किसी बीच के रास्ते पर सहमत हो सकते हैं। अगर सरकार परिसीमन की शर्त को हटा देती है, तो शायद विपक्ष इस बिल का समर्थन कर दे। लेकिन सरकार के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में किसी सर्वसम्मति पर पहुंचना फिलहाल मुश्किल लग रहा है। राजनीति में अक्सर असंभव दिखने वाली चीजें भी संभव हो जाती हैं, लेकिन इस वक्त दोनों पक्षों के बीच जो कड़वाहट दिखी है, उसे कम होने में वक्त लगेगा। देश की महिलाओं को अभी अपने हक के लिए और लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
#Mahila Aarkshan
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