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बहुत समय पहले की बात है। नीलाचल धाम, श्री जगन्नाथ पुरी में वार्षिक रथ यात्रा का भव्य उत्सव चल रहा था। चारों दिशाओं से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचे थे। पूरा नगर "जय जगन्नाथ" के जयघोष, शंखध्वनि, मृदंग और कीर्तन से गूंज रहा था। मंदिर के विशाल प्रांगण में श्रद्धालुओं की ऐसी भीड़ उमड़ी थी कि कदम रखने तक की जगह नहीं बची थी। हर भक्त के चेहरे पर अपने प्रभु के दर्शन की लालसा और महाप्रसाद पाने की आशा झलक रही थी। कोई दूर-दराज के गांवों से पैदल आया था, कोई जंगलों और पहाड़ों को पार करके पहुंचा था, तो कोई कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद पहली बार श्रीक्षेत्र के दर्शन करने आया था।
उसी भीड़ में एक वृद्ध विधवा अपने दो छोटे पोतों के साथ धीरे-धीरे मंदिर की ओर बढ़ रही थी। उसके वस्त्र पुराने थे, पैरों में चप्पल भी नहीं थी और चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसके साथ एक गरीब किसान भी था, जिसने रास्ते भर उन बच्चों को सहारा दिया था। तीनों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। यात्रा के दौरान जो थोड़ा-बहुत भोजन साथ लाए थे, वह दो दिन पहले ही समाप्त हो चुका था। बच्चे भूख से व्याकुल थे, लेकिन उनकी दादी उन्हें बार-बार समझाती, "बेटा, धैर्य रखो। हम जगन्नाथ के घर आए हैं। यहां से कोई भक्त भूखा नहीं लौटता। प्रभु अपने बच्चों का ध्यान अवश्य रखते हैं।"
मंदिर के भीतर उस दिन महाप्रसाद की व्यवस्था करने वाले सेवकों पर असाधारण दबाव था। रसोई में सैकड़ों रसोइए लगातार भोजन बना रहे थे। विशाल हांड़ियों में खिचड़ी, दाल, सब्जियां और भोग तैयार हो रहे थे। लेकिन श्रद्धालुओं की संख्या इतनी अधिक थी कि भोजन कम पड़ने लगा। सेवक चिंतित थे। कई भक्तों को प्रसाद मिल गया, लेकिन हजारों लोग अब भी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ निराश होकर लौटने लगे। किसी ने कहा, "आज शायद हमें प्रसाद नहीं मिलेगा।" यह सुनकर कई वृद्ध, महिलाएं और बच्चे उदास हो गए।
उसी समय भगवान जगन्नाथ अपने दिव्य सिंहासन से यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने देखा कि उनके अपने भक्त भूखे लौट रहे हैं। उनके करुणामय हृदय में पीड़ा उमड़ पड़ी। उन्होंने माता लक्ष्मी की ओर देखा और गंभीर स्वर में कहा, "देवी, मेरे द्वार से यदि कोई भक्त भूखा लौट जाए, तो इससे बड़ा दुख मेरे लिए और क्या हो सकता है?" माता लक्ष्मी ने मधुर मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "प्रभु, आज आपके भक्तों की नहीं, आपकी करुणा की परीक्षा है।"
इतना सुनते ही भगवान जगन्नाथ ने बिना एक क्षण विलंब किए अपना दिव्य रूप त्याग दिया। उन्होंने एक साधारण ग्रामीण युवक का रूप धारण किया। उनके शरीर पर साधारण धोती थी, सिर पर एक कपड़ा बंधा था और चेहरे पर अत्यंत सरल, मधुर मुस्कान थी। उन्हें देखकर कोई भी यह नहीं पहचान सकता था कि यही स्वयं जगत के पालनहार हैं। वे चुपचाप मंदिर के पीछे स्थित उस विशाल आंगन में पहुंचे जहां कुछ वृद्ध महिलाएं और सेवक जल्दी-जल्दी आटा गूंध रहे थे, ताकि जितना संभव हो सके उतने लोगों के लिए रोटियां तैयार की जा सकें।
युवक बिना कुछ कहे वहीं बैठ गया। उसने अपने हाथों में आटा लिया और बड़े प्रेम से रोटियां बेलने लगा। पास बैठी एक वृद्धा मुस्कुराकर बोली, "बेटा, लगता है पहले कभी रोटियां नहीं बनाई।" युवक भी मुस्कुराया और बोला, "मां, आज पहली बार अपने परिवार के लिए बना रहा हूं।" उसके उत्तर में ऐसी आत्मीयता थी कि वहां बैठे सभी लोग सहज ही उसके अपने बन गए। धीरे-धीरे सभी भक्त उसके साथ मिलकर काम करने लगे। कोई आटा गूंधने लगा, कोई रोटियां बेलने लगा, कोई तवे पर सेंकने लगा और कोई घी लगा-लगाकर उन्हें टोकरी में रखने लगा।
कुछ ही देर बाद एक अद्भुत चमत्कार होने लगा। जितना आटा उपयोग किया जाता, परात में उससे कहीं अधिक आटा अपने आप दिखाई देने लगता। घी का पात्र कभी खाली नहीं होता। लकड़ियां समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं। रोटियां इतनी तेजी से बनने लगीं कि कोई गिन भी नहीं पा रहा था। पूरे आंगन में ताजी रोटियों की सुगंध फैल गई। भूखे बैठे भक्तों को गरमागरम रोटियां और महाप्रसाद मिलने लगा। बच्चों के चेहरे खिल उठे। वृद्धों की आंखों में संतोष के आंसू आ गए। कोई कह रहा था, "इतना स्वादिष्ट भोजन जीवन में कभी नहीं खाया।" कोई हाथ जोड़कर बार-बार भगवान का नाम ले रहा था।
वह वृद्ध विधवा भी अपने दोनों पोतों के साथ वहीं बैठ गई। जैसे ही उसके हाथ में गरम रोटी आई, उसकी आंखें भर आईं। उसने रोटी को माथे से लगाया और बोली, "प्रभु, मुझे पता था कि आप अपने बच्चों को भूखा नहीं रहने देंगे।" उसके दोनों पोते प्रेम से भोजन करने लगे। कई दिनों बाद उनके चेहरे पर मुस्कान लौटी थी। गरीब किसान भी प्रसाद ग्रहण करते हुए बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रहा था।
उधर मंदिर के सेवकों को आश्चर्य हुआ कि जिन भक्तों को प्रसाद नहीं मिल पाया था, वे सब अचानक तृप्त होकर लौट रहे हैं। उन्होंने देखा कि मंदिर के पीछे हजारों लोगों को भोजन कराया जा रहा है। वे दौड़ते हुए वहां पहुंचे। उनके सामने रोटियों के विशाल ढेर लगे थे। घी, आटा और भोजन जैसे समाप्त ही नहीं हो रहे थे। मुख्य पुजारी भी वहां पहुंचे। उन्होंने चारों ओर देखा और पूछा, "यह सब किसने किया?" लोगों ने उस साधारण युवक की ओर इशारा करना चाहा, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दिया। वह बिना किसी को बताए चुपचाप वहां से जा चुका था।
मुख्य पुजारी कुछ क्षण मौन रहे। फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते स्वर में कहा, "यह कोई साधारण मनुष्य नहीं था। आज स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों की सेवा करने आए थे। उन्होंने ही अपने हाथों से रोटियां बनाईं और अपने बच्चों की भूख मिटाई।" यह सुनते ही वहां उपस्थित सभी भक्त "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से गूंज उठे। पूरा वातावरण भक्ति और प्रेम से भर गया।
जब पुजारी गर्भगृह में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भगवान जगन्नाथ के श्रीविग्रह के हाथों पर आटे की हल्की परत लगी हुई थी और उनके अधरों पर वैसी ही मधुर मुस्कान थी जैसी उस ग्रामीण युवक के चेहरे पर थी। अब किसी के मन में कोई संदेह नहीं रहा। सभी समझ गए कि प्रभु ने स्वयं अपने भक्तों की सेवा की है। यह समाचार कुछ ही समय में पूरे श्रीक्षेत्र में फैल गया। लोग एक-दूसरे से कहते, "आज हमने अपनी आंखों से देखा कि भगवान केवल मंदिर में विराजमान नहीं रहते, वे अपने भक्तों के बीच भी आते हैं।"
उस दिन के बाद से पुरी धाम में यह विश्वास और भी गहरा हो गया कि भगवान जगन्नाथ को राजसी वैभव से अधिक अपने भक्तों की सेवा प्रिय है। उन्हें सोने-चांदी के महलों से अधिक वह स्थान प्रिय है जहां किसी भूखे को प्रेम से भोजन कराया जाता है। वे उसी रोटी को सबसे उत्तम भोग मानते हैं जो अहंकार से नहीं, सेवा, करुणा और निष्काम प्रेम से बनाई गई हो।
आज भी श्री जगन्नाथ धाम में यह कथा श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है कि जब भी कोई भूखा प्रेम से प्रभु को पुकारता है, भगवान किसी न किसी रूप में उसकी सहायता अवश्य करते हैं। वे केवल सिंहासन पर विराजने वाले देवता नहीं, बल्कि अपने भक्तों के सुख-दुख में सहभागी बनने वाले करुणामय पिता हैं। यही कारण है कि भक्त पूरे विश्वास के साथ कहते हैं—जिसके सिर पर जगन्नाथ का हाथ हो, वह कभी भूखा, असहाय या अकेला नहीं रह सकता।
जय जगन्नाथ।