एक पर्वत की चोटी पर दो सन्यासी रहते थे। जो ईश्वर की उपासना करते थे और एक दूसरे से प्यार करते थे।
उन दोनों सन्यासियों के पास एक मिट्टी का बर्तन था और वह इकलौता बर्तन ही उन दोनों सन्यासियों की पूंजी थी।
एक दिन एक बुरी आत्मा वृद्ध सन्यासी के भीतर प्रविष्ट हो जाती है। और ततपश्चात वृद्ध सन्यासी जवान सन्यासी के पास जाता है और कहता है कि हम एक लंबे अरसे से एक साथ रह रहे हैं और अब समय आ गया है कि हम अलग हो जाएं। और इसके साथ ही चलो हम अपनी पूंजी रूपी मिट्टी के बर्तन को बांट लें।
वृद्ध सन्यासी की बात सुन जवान सन्यासी दुखी हो जाता है। और कहता है कि आप मुझे छोड़कर जा रहे हैं यह मेरे लिए बेहद पीड़ादायक है, मैं चाहता हूँ कि आप मुझे न छोड़े लेकिन फिर भी आप जाना चाहते हैं तो मैं आपको रोकूंगा नहीं। यह लीजिए हमारा इकलौता मिट्टी का बर्तन। हालांकि हम इसे बांट नहीं सकते। यह आप रख लीजिए।
जवान सन्यासी कि यह बात सुन वृद्ध सन्यासी बोल पड़ा। मैं दान पुण्य स्वीकार नहीं करूंगा। मैं कुछ नहीं लूंगा लेकिन अपना हिस्सा भी नहीं छोडूंगा। इस बर्तन का बटवारा अवश्य होगा।
इसके बाद जवान सन्यासी कहता है कि अगर मिट्टी का बर्तन तोड़ देंगे तो यह न आपके इस्तेमाल करने के लायक बचेगा और न ही मेरे।
हम ऐसा करते हैं कि इसका फैसला भाग्य से करते हैं।
मैं अपना न्याय इस तरह भाग्य पर नहीं छोड़ सकता। मुझे अपने न्याय पर विश्वास है भाग्य पर नहीं। यह मिट्टी का पात्र अवश्य बटेगा वृद्ध सन्यासी एक बार फिर बोल पड़ता है।
जवान सन्यासी के इतने प्रयासों के बावजूद जब सन्यासी न मल तो जवान सन्यासी ने फैसला किया कि ठीक है हम यह मिट्टी का बर्तन तोड़ देते हैं। आप अपना हिस्सा ले लेना और मैं अपना हिस्सा ले लूंगा।
इतना कहते ही जवान सन्यासी ने मिट्टी का बर्तन जमीन पर यएक दिया और बर्तन के टूटते ही वृद्ध सन्यासी का चेहरा लाल पड़ गया। और वह चिल्लाया 'ओ कायर' तूने मेरा मिट्टी का बर्तन तोड़ दिया। द मुझसे जीत नहीं सकता है
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