sn vyas
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा- 4️⃣6️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(बकवधपर्व)
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मण-कन्या के त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्ती का उन सबके पास जाना...(दिन 4642)
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अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम ।
पीडिताहं भविष्यामि तदवेक्षस्व मामपि ।। १४ ।।
'द्विजश्रेष्ठ पिताजी ! यदि आप मुझे त्यागकर स्वयं राक्षसके पास चले जायँगे तो मैं बड़े दुःखमें पड़ जाऊँगी। अतः मेरी ओर भी देखिये ।। १४ ।।
तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं स सत्तम । आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च संत्यज ।। १५ ।।
'अतः हे साधुशिरोमणे! आप मेरे लिये, धर्मके लिये तथा संतानकी रक्षाके लिये भी अपनी रक्षा कीजिये और मुझे, जिसको एक दिन छोड़ना ही है, आज ही त्याग दीजिये ।। १५ ।।
अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोऽत्यगादयम् । किं त्वतः परमं दुःखं यद् वयं स्वर्गते त्वयि ।। १६ ।।
याचमानाः परादन्नं परिधावेमहि श्ववत् । त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात् सबान्धवे । अमृते वसती लोके भविष्यामि सुखान्विता ।। १७ ।।
'पिताजी ! जो काम अवश्य करना है, उसका निश्चय करनेमें आपको अपना समय व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये (शीघ्र मेरा त्याग करके इस कुलकी रक्षा करनी चाहिये)। हमलोगोंके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा कि आपके स्वर्गवासी हो जानेपर हम दूसरोंसे अन्नकी भीख माँगते हुए कुत्तोंकी तरह इधर-उधर दौड़ते फिरें। यदि मुझे त्यागकर आप अपने भाई-बन्धुओंसहित इस क्लेश से मुक्त हो नीरोग बने रहें तो मैं
अमरलोक में निवास करती हुई बहुत सुखी होऊँगी ।। १६-१७ ।।
इतः प्रदाने देवाश्च पितरश्चेति न श्रुतम् । त्वया दत्तेन तोयेन भविष्यन्ति हिताय वै ।। १८ ।।
'यद्यपि ऐसे दानसे देवता और पितर प्रसन्न नहीं होते, ऐसा मैंने सुन रखा है, तथापि आपके द्वारा दी हुई जलांजलिसे वे प्रसन्न होकर अवश्य हमारा हित-साधन करनेवाले होंगे' ।। १८ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं बहुविधं तस्या निशम्य परिदेवितम् । पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रयः ।। १९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस तरह उस कन्याके मुखसे नाना प्रकारका विलाप सुनकर पिता-माता और वह कन्या तीनों फूट-फूटकर रोने लगे ।। १९ ।।
ततः प्ररुदितान् सर्वान् निशम्याथ सुतस्तदा । उत्फुल्लनयनो बालः कलमव्यक्तमब्रवीत् ।। २० ।।
तब उन सबको रोते देख ब्राह्मणका नन्हा सा बालक उन सबकी ओर प्रफुल्ल नेत्रोंसे देखता हुआ तोतली भाषामें अस्पष्ट एवं मधुर वचन बोला ।। २० ।।
मा पिता रुद मा मातर्मा स्वसस्त्विति चाब्रवीत् । प्रहसन्निव सर्वांस्तानेकैकमनुसर्पति ।। २१ ।।
ततः स तृणमादाय प्रहृष्टः पुनरब्रवीत् । अनेनाहं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम् ।। २२ ।।
'पिताजी! न रोओ, माँ! न रोओ, बहिन! न रोओ, वह हँसता हुआ-सा प्रत्येकके पास जाता और सबसे यही बात कहता था। तदनन्तर उसने एक तिनका उठा लिया और अत्यन्त हर्षमें भरकर कहा- 'मैं इसीसे उस नरभक्षी राक्षसको मार डालूँगा' ।। २१-२२ ।।
तथापि तेषां दुःखेन परीतानां निशम्य तत् ।
बालस्य वाक्यमव्यक्तं हर्षः समभवन्महान् ।। २३ ।।
यद्यपि वे सब लोग दुःखमें डूबे हुए थे, तथापि उस बालककी अस्पष्ट तोतली बोली सुनकर उनके हृदयमें सहसा अत्यन्त प्रसन्नताकी लहर दौड़ गयी ।। २३ ।।
अयं काल इति ज्ञात्वा कुन्ती समुपसृत्य तान् । गतासूनमृतेनेव जीवयन्तीदमब्रवीत् ।। २४ ।।
'अब यही अपनेको प्रकट करनेका अवसर है' यह जानकर कुन्तीदेवी उन सबके निकट गयीं और अपनी अमृतमयी वाणीसे उन मृतक (तुल्य) मानवोंको जीवन प्रदान करती हुई-सी बोलीं ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणकन्यापुत्रवाक्ये अष्टपञ्चशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी कन्या और पुत्रके वचन-सम्बन्धी एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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