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#☝आज का ज्ञान #😛 व्यंग्य 😛 #☝ मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🤟 सुपर स्टेटस
☝आज का ज्ञान - फूटे हुये गोलगप्पो की कहानी ज्यादातर लोग पूजा पाठ,या मंदिर, और तथाकथित के पास इसलिए 353/ थोड़ी जाते है,कि इनकी अंधी कामनाओं का विलोप हो,बल्कि इसलिए जाते है, मोहर ताकि इनकी अंधी कामनाओं और अंधे स्वार्थो पर लग जाये ऊपर से धर्म की,और मजे की बात तथाकथित बाबा जी लगा भी देते है,बिना भगतो के मन के पेपर को पढ़े।क्योंकि दुकान है,दुकान।दुकानदारी थोड़ी ख़तम करानी है। दुकानदारी मतलब रिश्वत, मोहर लगाने , धार्मिकता का प्रमाण पत्र देने के लिए पैसे , उसको भी धार्मिक स्टाइल में  दान पात्र में डाल दो बच्चा,ताकि हम दुकानदार भी ना कहलाये।और दुकानदारी भी चलती रहे।और आजकल तथाकथित बाबाओ की बहुत सजी है,बैठे है, मोहरे लेकर,कोई हाथ देख दुकाने रहे है,कोई टांगे , कोई,कुंडली, कोई पीठ पता नहीं आजकल और क्या क्या देख Hr लगाई जा रही है।और मोहर लगवाने वालों की लम्बी लम्बी कतारे कर लगी है,कोई हाथ आगे करके खडा है,कोई टांगे कोई पीठ आदि आदि। अंधे अंधो को ठेले ही जा रहे है। समझ ही नी आती ये बात कोई इंसान कैसे इतने पूजा पाठ, मंदिर जाकर, और तथाकथित धर्म गुरुओ से गुरु मंत्र लेकर भी वंहा से आते ही,उसके अंदर के जानवर भोंकने लगते है।ये है लोकधर्म।वही है,ये जैसे गधा शेर की खाल पहन ले ऊपर से और जैसे ही हरी हरी घास देखते ही खुश हो जाये और बोले ढेचूँ ढेचूँ । की ढेंचू वही इनका है ऊपर से धर्म और जँहा अंधे स्वार्थ और कामना दिखी नहीं ढेंचू।और इन भक्तजनों को कोई अगर कुछ ठीक बात भी तो,इनको समझाये समझ नहीं आती क्यों?क्योकि भक्तजनों की हालत ऐसी है,जैसे फूटा हुआ गोलगप्पा उसमे ऊपर से कुछ अच्छा डालो भी तो वो बह जाता है।अभी भी फूटे हुये गोलगप्पो को ये बात समझ थोड़ी आयेगी।बस बह जायेगी। का तो इसको पढ़कर ये हाल होगा जैसे किसी खराब कुकर को चूल्हे पर कुछो रख दो और उसमे सिटी ही ना आये,और वो फट जाये।ब्लास्ट! असली धार्मिक गुरु वही होते है,जो अपने भगतो के अंदर भौक रहे कुत्ते, और जानवरों की चीखे, मतलब अंधी कामनाओं, और अंधे स्वार्थो पर लगाम अन्य लगाना सिखाते है।लेकिन मुश्किल है,क्योंकि फिर इनको अपनी धार्मिक दुकाने बंद होने का खतरा लगता है। फूटे हुये गोलगप्पो की कहानी ज्यादातर लोग पूजा पाठ,या मंदिर, और तथाकथित के पास इसलिए 353/ थोड़ी जाते है,कि इनकी अंधी कामनाओं का विलोप हो,बल्कि इसलिए जाते है, मोहर ताकि इनकी अंधी कामनाओं और अंधे स्वार्थो पर लग जाये ऊपर से धर्म की,और मजे की बात तथाकथित बाबा जी लगा भी देते है,बिना भगतो के मन के पेपर को पढ़े।क्योंकि दुकान है,दुकान।दुकानदारी थोड़ी ख़तम करानी है। दुकानदारी मतलब रिश्वत, मोहर लगाने , धार्मिकता का प्रमाण पत्र देने के लिए पैसे , उसको भी धार्मिक स्टाइल में  दान पात्र में डाल दो बच्चा,ताकि हम दुकानदार भी ना कहलाये।और दुकानदारी भी चलती रहे।और आजकल तथाकथित बाबाओ की बहुत सजी है,बैठे है, मोहरे लेकर,कोई हाथ देख दुकाने रहे है,कोई टांगे , कोई,कुंडली, कोई पीठ पता नहीं आजकल और क्या क्या देख Hr लगाई जा रही है।और मोहर लगवाने वालों की लम्बी लम्बी कतारे कर लगी है,कोई हाथ आगे करके खडा है,कोई टांगे कोई पीठ आदि आदि। अंधे अंधो को ठेले ही जा रहे है। समझ ही नी आती ये बात कोई इंसान कैसे इतने पूजा पाठ, मंदिर जाकर, और तथाकथित धर्म गुरुओ से गुरु मंत्र लेकर भी वंहा से आते ही,उसके अंदर के जानवर भोंकने लगते है।ये है लोकधर्म।वही है,ये जैसे गधा शेर की खाल पहन ले ऊपर से और जैसे ही हरी हरी घास देखते ही खुश हो जाये और बोले ढेचूँ ढेचूँ । की ढेंचू वही इनका है ऊपर से धर्म और जँहा अंधे स्वार्थ और कामना दिखी नहीं ढेंचू।और इन भक्तजनों को कोई अगर कुछ ठीक बात भी तो,इनको समझाये समझ नहीं आती क्यों?क्योकि भक्तजनों की हालत ऐसी है,जैसे फूटा हुआ गोलगप्पा उसमे ऊपर से कुछ अच्छा डालो भी तो वो बह जाता है।अभी भी फूटे हुये गोलगप्पो को ये बात समझ थोड़ी आयेगी।बस बह जायेगी। का तो इसको पढ़कर ये हाल होगा जैसे किसी खराब कुकर को चूल्हे पर कुछो रख दो और उसमे सिटी ही ना आये,और वो फट जाये।ब्लास्ट! असली धार्मिक गुरु वही होते है,जो अपने भगतो के अंदर भौक रहे कुत्ते, और जानवरों की चीखे, मतलब अंधी कामनाओं, और अंधे स्वार्थो पर लगाम अन्य लगाना सिखाते है।लेकिन मुश्किल है,क्योंकि फिर इनको अपनी धार्मिक दुकाने बंद होने का खतरा लगता है। - ShareChat