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! एक शाम चाहता हूं ! ये समझदारी मुझे धीरे धीरे मार रही है, मैं नादानों वाली एक शाम चाहता हूं, तुम चाहते होगे पहचान इस जहान में, मैं तो मौत भी अपनी गुमनाम चाहता हूं।। लेखक:-मनोज चौहान, 🌹✍️.. #🌷..chauhan..💐🌺
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