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🌹प्रेम ओर विश्वास🌹
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एक छोटे से कस्बे में गंगा दादी नाम की एक वृद्ध महिला रहती थीं। उम्र ज़्यादा थी, लेकिन मन बिल्कुल बच्चे जैसा साफ़ और निश्छल था। पूरे गाँव में उनकी पहचान एक सीधी-सादी और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाली महिला के रूप में थी। जो कोई उनसे कुछ कह देता, वे बिना किसी संदेह के मान लेतीं।
घर में बेटा, बहू और दो नन्हे पोते थे। गंगा दादी का दिन बच्चों को खिलाने-पिलाने, घर के छोटे-मोटे काम करने और भगवान का नाम लेने में ही बीत जाता। वे कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करती थीं। हर सुबह मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
गाँव के लोग अक्सर हँसते हुए पूछते, "दादी, रोज़ मंदिर जाकर क्या मिलता है?"
गंगा दादी मुस्कुराकर कहतीं, "मुझे तो मेरे कान्हा मिलते हैं।"
लोग इसे उनकी मासूमियत समझकर हँस देते, लेकिन दादी कभी किसी की बात का बुरा नहीं मानती थीं।
एक दिन मंदिर के महंत जी को अचानक तीन दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। उन्होंने गंगा दादी से कहा, "दादी, जब आप रोज़ भगवान से मिलने आती ही हैं, तो क्या इन दो-तीन दिनों तक मंदिर की सेवा संभाल लेंगी? भगवान के लिए भोजन बना देना और मंदिर का ध्यान रखना।"
दादी ने सहज भाव से कहा, "अगर यह मेरे कान्हा की सेवा है, तो मैं कैसे मना कर सकती हूँ?"
महंत जी चले गए।
अगली सुबह दादी ने पानी की बाल्टी रखी और बड़े अपनापन से बोलीं, "कान्हा, आओ... पहले स्नान कर लो। मैं बूढ़ी हो गई हूँ, अब तुम अपने हाथ से नहा लेना।"
फिर बोलीं, "ये साफ़ कपड़े रखे हैं, पहन लेना। चंदन भी यहीं है, लगा लेना।"
दादी पूरे विश्वास के साथ रसोई में चली गईं। थोड़ी देर बाद उन्होंने प्रेम से भोजन परोसा और बोलीं, "लो कान्हा, गरम-गरम खाना तैयार है, आराम से खा लेना।"
उनके लिए भगवान किसी पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि घर के अपने सदस्य जैसे थे।
दो दिन तक यही क्रम चलता रहा। दादी भगवान से ऐसे ही बातें करतीं, जैसे कोई अपने सबसे प्रिय व्यक्ति से करता है।
तीसरे दिन महंत जी लौटे और मुस्कुराकर बोले, "दादी, सेवा ठीक से हो गई ना?"
दादी ने मासूमियत से कहा, "मैंने तो सिर्फ़ खाना बनाया। बाकी मेरे कान्हा ने अपने सारे काम खुद ही कर लिए। अब मैं बहुत थक गई हूँ, घर जाना चाहती हूँ।"
महंत जी को यह बात समझ नहीं आई। उन्होंने विनती की, "दादी, बस आज एक दिन और रुक जाइए।"
दादी मान गईं।
इस बार महंत जी चुपचाप एक कोने में छिपकर देखने लगे।
गंगा दादी ने फिर वही स्नेह से आवाज़ लगाई, "कान्हा... आ जाओ, नहा लो।"
कुछ ही क्षणों में ऐसा अद्भुत दृश्य सामने आया कि महंत जी की आँखें नम हो गईं। उन्हें ऐसा दिव्य अनुभव हुआ, मानो स्वयं भगवान उनकी भोली भक्त की पुकार पर उपस्थित होकर उसकी सेवा स्वीकार कर रहे हों।
महंत जी भाव-विभोर होकर दादी के चरणों में झुक गए और बोले,
"दादी, मैंने वर्षों तक पूजा की, लेकिन आज समझ आया कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता केवल विधि-विधान नहीं, बल्कि सच्चा विश्वास और निष्कपट प्रेम है।"
गंगा दादी मुस्कुरा दीं। उन्हें तो लगा जैसे रोज़ की तरह आज भी उनके कान्हा उनसे मिलने आए थे।
सीख:
भगवान को बड़े-बड़े शब्द, दिखावा या आडंबर नहीं चाहिए। वे तो केवल सच्चे मन, निष्कपट प्रेम और अटूट विश्वास से प्रसन्न हो जाते हैं।
मंगलमय प्रभात
प्रणाम #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ #❤️जीवन की सीख #👍 डर के आगे जीत👌 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #🏠घर-परिवार