sn vyas
भक्ति मार्ग में यह कहा गया #भक्ति #भक्ति भावना #भक्ति मार्ग #भक्ति मार्ग है कि— "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।" इसी भाव को पुष्ट करती यह कथा दो मित्रों की है, जो परम भक्त थे। इनमें से एक भगवान श्रीराम का अनन्य उपासक था और दूसरा भगवान श्रीकृष्ण का। दोनों के हृदय में अपने-अपने इष्ट के प्रति अगाध श्रद्धा थी, किंतु मानवीय स्वभाव के कारण उनमें अक्सर यह बहस छिड़ जाती थी कि किसके भगवान अधिक श्रेष्ठ और शीघ्र फल देने वाले हैं।
एक बार वे दोनों एक सघन वन से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने अपनी इस दुविधा का अंत करने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि हम दोनों अपने-अपने इष्टदेव को पुकारेंगे। जो भगवान पहले दर्शन देंगे, उन्हीं को श्रेष्ठ माना जाएगा।
दोनों अपनी-अपनी साधना में लीन हो गए। कृष्ण-भक्त ने भाव विभोर होकर पुकारा और देखते ही देखते मुरलीधर श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराते हुए प्रकट हो गए। कृष्ण-भक्त की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने बड़े गर्व से अपने मित्र की ओर देखा। कुछ समय बीता, फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी वहां प्रकट हुए। राम-भक्त ने प्रभु के चरणों में शीश तो नवाया, पर उसके मन में टीस थी। उसने उलाहना देते हुए कहा, "हे प्रभु! आपने आने में इतनी देर क्यों कर दी? श्रीकृष्ण तो क्षण भर में आ गए और आपके विलंब के कारण मैं अपने मित्र से हार गया।"
भगवान श्रीराम ने मंद मुस्कान के साथ अपने भक्त से पूछा, "वत्स, यह बताओ कि तुमने मुझे किस रूप में स्मरण किया था?"
भक्त ने उत्तर दिया, "प्रभु! मैंने आपको साकेत बिहारी, चक्रवर्ती सम्राट और 'राजाधिराज' के रूप में पुकारा था।"
श्रीराम बोले, "पुत्र, जब तुमने मुझे राजाधिराज के रूप में याद किया, तो मैं सामान्य व्यक्ति की भांति दौड़कर कैसे आ सकता था? राजा के आने के लिए पहले सवारी तैयार होती है, लश्कर सजता है और पूरी राजसी व्यवस्था की जाती है। इसी कारण मुझे आने में समय लगा।"
अब श्रीकृष्ण के भक्त से पूछा गया कि उसने प्रभु को कैसे याद किया? उसने कहा, "मैंने तो केवल यह सोचा कि मेरे कान्हा 'गौपाल' हैं, वे इसी वन में कहीं गाय चरा रहे होंगे। मैंने उन्हें एक साधारण ग्वाले के रूप में पुकारा और वे तुरंत झाड़ियों से निकलकर सामने आ गए।