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शक ना कर मेरी हिम्मत पर, मैं ख्वाब बुन लेता हूँ टूटे धागों को जोड़कर... #❤️जीवन की सीख #👍 डर के आगे जीत👌 #🌸 सत्य वचन #👨🏻‍💼इंग्लिश मोटिवेशनल #📖जीवन का लक्ष्य🤔
❤️जीवन की सीख - बहुत समय पहले की बात है। शास्त्रार्थ में निर्णायक थीं- हार ्जीत आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्वन मंडन मिश्न की धर्म पली के बीच सोलह दिन तक लगातार देवी भारती| का फैसला ! शास्त्रार्थ चला| एक प्रेरणादायक कहानी हार ्जीत का निर्णय होना बाकी था, "ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक॰एक इसी बीच देवी भारती को किसी में आपके हार और जीत का आवश्थक कार्य से कुछ समय के फूल माला डालते हुए कहा, फैसला ` க்ரி" लिवे बाहर जाना पड़ गया। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से कुछ देर पश्चात देवी भारती अपना शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे शंकराचार्य और मंडन मिश्व को चलती रही। कार्य पूरा करके लौट आई। बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। निर्णय के अनुसार आदि शंकराचार्य নিম্লান ' ने जिज्ञासा की- देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- एक 10 विजयी घोषित किये गये और हे ! देवी आप तो शास्त्रार्थ के भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ में 56 उनके पति मंडन मिश्न की সংয ৪ী বলী যৎ থী কিং বাপম पराजित होने लगता है, और उसे जब पराजय हुई थी। लौटते ही आपने ऐसा फैसला हार की झलक दिखने लगती है तो इस कैसे दे दिया वजह से वह क्रुद्ध हो उठता है। सभी दर्शक हैरान रह गये। मेरे पति के गले की माला उनके सीख जबकि शंकराचार्य जी की इससे ज्ञात होता है कि की ताप से सूख चुकी है अभी भी पहले ক কুল ' शंकराचार्य की विजय हुई है। क्रोध क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है माला की भांति ताजे हैं। जो जीत के नजदीक पहुंचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों में दरार का कारण भी बनता है। सभी ने देवी भारती की इसलिए कभी भी कोध के ताप से 341 काफी प्रेशंसा की। अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिए। बहुत समय पहले की बात है। शास्त्रार्थ में निर्णायक थीं- हार ्जीत आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्वन मंडन मिश्न की धर्म पली के बीच सोलह दिन तक लगातार देवी भारती| का फैसला ! शास्त्रार्थ चला| एक प्रेरणादायक कहानी हार ्जीत का निर्णय होना बाकी था, "ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक॰एक इसी बीच देवी भारती को किसी में आपके हार और जीत का आवश्थक कार्य से कुछ समय के फूल माला डालते हुए कहा, फैसला ` க்ரி" लिवे बाहर जाना पड़ गया। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से कुछ देर पश्चात देवी भारती अपना शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे शंकराचार्य और मंडन मिश्व को चलती रही। कार्य पूरा करके लौट आई। बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। निर्णय के अनुसार आदि शंकराचार्य নিম্লান ' ने जिज्ञासा की- देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- एक 10 विजयी घोषित किये गये और हे ! देवी आप तो शास्त्रार्थ के भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ में 56 उनके पति मंडन मिश्न की সংয ৪ী বলী যৎ থী কিং বাপম पराजित होने लगता है, और उसे जब पराजय हुई थी। लौटते ही आपने ऐसा फैसला हार की झलक दिखने लगती है तो इस कैसे दे दिया वजह से वह क्रुद्ध हो उठता है। सभी दर्शक हैरान रह गये। मेरे पति के गले की माला उनके सीख जबकि शंकराचार्य जी की इससे ज्ञात होता है कि की ताप से सूख चुकी है अभी भी पहले ক কুল ' शंकराचार्य की विजय हुई है। क्रोध क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है माला की भांति ताजे हैं। जो जीत के नजदीक पहुंचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों में दरार का कारण भी बनता है। सभी ने देवी भारती की इसलिए कभी भी कोध के ताप से 341 काफी प्रेशंसा की। अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिए। - ShareChat